kinkinee ne khabar bhejee sharanaagat ko hamaare havaale karo!khule me abgrejon ne phaansee isaliye -dee taaki baagee krantikaaree dar jaen

किन्किनी ने खबर भेजी शरणागत को हमारे हवाले करो!खुले मे अब्ग्रेजों ने फाँसी इसलिये -दी ताकि बागी क्रन्तिकारी डर जाएं

दमोह-17-18सितम्बर 1857की दर्मियानी रात-प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम की दमोह जिले की वह रणबांकुरौं की अंग्रेजों से लडाई-द13-16सितम्बर की दमोह तहसील को आग लगाना-किशोर सिंह द्वारा खजाने को लूटना-इसके बाद सागर और जबलपुरसे अन्ग्रेज कुमुक का आना विद्रोह दबाने मेजर किन्किनी का अन्ग्रेजी सेना का नेतृत्व कर इन्फेन्टरी-और तोपों के साथ नरसिंघगढ़ पहुन्च्ना-किले में थे-शाहगाढ़ के राजा-छत्रसाल के वंशज बखतबलि के सिपाही-जिन्हे-मराठा सूबेदार पं रघुनाथराव करमरकर ने अपने दीवान पं अजाब दास तिवारी से मशविरा कर अपने किले मे शरण दी थी-किन्किनी ने खबर भेजी शरणागत को हमारे हवाले करो!-
मराठा परम्परा का पालन करते हुए-शरणागत को सौपने की मांग ठुकरा दी गयी-फड़ण्वीस रामचन्द्र राव को-तोपें बन्दूकों से सामना करने का हुक्म दिया गया-खतरे को भांप कर पं रघुनाथ राव ने गुप्त दरवाजे से बागियों को बाहर किया!-

पं रघुनाथ राव के पूर्वज पं पान्डुरन्गराव पेशवा बाजीराव के साथ बुन्देल्केसरी छत्रसाल पर मालवा के सूबेदार म्हम्मद्खां बन्गश के हमले पर और अजयगढ के किले में कैद कर दिये जाने के बाद-उन्हे बचाने आये थे-तब बुन्देलखण्ड के राज्य मे मिले हिस्से-गढपहरा-अटा-मालथोन-सागर-गढ़ाकोटा-दमोह-कटनी-विजयराघोगढ़-तक का क्षेत्र पेशवा को मिला था-दमोह जिले मे 7सूबेदार-या मामलातदार बनाये गये थे-उनमे शामिल थे-मेजर किन्किनी ने तोपदारी से किले के बुर्जों को क्षितिगृस्त कर ब्रिटिश फौज-मद्रास इन्फन्टरी किले मे घुसी-पं रघुनाथरावपं राम्चन्द्र राव फड़ण्वीस पं अजाब दास तिवारी सहित सैनिकों को थोडे से रक्त पात लगभग 70सैनिकों की हत्या कर पकड लिया- पं रघुनाथ राव करमरकर व रांचन्द्र्राव फड़ण्वीस को किले पर ही-व पं अजाब दास तिवारी व उनके 18परिजनों को निकट के नाले मे पेड़ों पे फांसी दे दी गयी-खुले मे अब्ग्रेजों ने फाँसी इसलिये -दी ताकि बागी क्रन्तिकारी डर जाएं–!18परिजनों में 6मांह का दुधमुंहा बच्चा भी था उसे भी न्हीं छोड़ा कि खीं क्रान्ति का बीज ना बचे!!-पं रघुनाथ राव की दो पत्नियों अन्नपूर्णा-राधाबाई व अल्पवयस्क पुत्र नारायण राव को किले से बेदखल कर दिया गया-वो अपने पूर्वज पं कृष्णाजी करमरकर के सन 1800में बसायेग्राम कृष्नगंज-वर्तमान किसुनगंज निवास हेतु पहुंचे-आज भी हम पं रघुनाथराव के वंशज दमोह-पूना अमरावती इंदौर-मुंबई-व विभिन्न स्थानों मे निवास कर बलिदान की स्मृति अक्षुन्ण रखे हुए हैं -आर वी रसल लिखित दमोह डिस्ट्रिक्ट गजेटियर (1901)व पारिवारिक दस्तावेजों के आधार पर-