आखिर क्यों? गर्भवती पत्नी का न्यायालय ने शून्य किया विवाह

शादी को हुए चार माह लेकिन 8 माह का था गर्भ

न्यायालय ने पत्नी को भरण-पोषण देने से भी किया इंकार

बैतूल। ‘चोरी ऊपर से सीना जोरीÓ यह कहावत एक पत्नी के ऊपर सौ फीसद उस समय चरितार्थ हुई जब न्यायालय ने पति द्वारा लगाई गई याचिका की सुनवाई उपरांत विवाह को शून्य घोषित कर दिया। जिले के मुलताई अपर सत्र न्यायाधीश कृष्णदास महान ने ऐसे ही एक प्रकरण में एक नवविवाहित युवक की याचिका पर न्यायालय ने विवाह को शून्य घोषित कर दिया। युवक का विवाह चार महीने पूर्व हुआ था और उसकी पत्नी को आठ माह का गर्भ था। पति द्वारा न्यायालय में विवाह शून्य घोषित करने की याचिका के बाद पत्नी द्वारा भरण-पोषण की राशि मांगी गई थी, लेकिन न्यायालय ने भरण-पोषण की राशि देने से भी इंकार कर दिया। पति की ओर से अधिवक्ता राजेंद्र उपाध्याय द्वारा पैरवी की गई है।

अधिवक्ता राजेंद्र उपाध्याय ने बताया कि उसके मुव्विकल का विवाह अपै्रल 2016 में उक्त युवती के साथ हुआ था। शादी के बाद जब पति को गर्भाधारण की बात पता चली तो डॉक्टर को दिखाया गया। डॉक्टर ने बताया कि युवती को 32 सप्ताह मतलब 8 महीने का गर्भ है, जबकि विवाह को केवल 4 महीने ही हुए थे। जिसके चलते युवक द्वारा न्यायालय के समक्ष विवाह को शून्य करने के लिए आवेदन प्रस्तुत किया गया था। मामले में कई डाक्टरों की गवाही एवं तर्को के बाद आखिरकार न्यायालय ने माना कि विवाह के पूर्व ही युवती गर्भवती थी, इसलिए न्यायालय ने इस विवाह को ही शून्य घोषित कर दिया। इधर युवती द्वारा न्यायालय के समक्ष पति से भरण-पोषण की राशि दिलाने के लिए आवेदन किया था, लेकिन न्यायालय ने कहा कि युवती भरण-पोषण की अधिकारिणी नहीं है, क्योंकि न्यायालय इस विवाह को ही शून्य घोषित कर दिया है। अधिवक्ता राजेंद्र उपाध्याय ने बताया कि चूंकि यह छोटी कोर्ट है इसलिए फैसले को बड़ी कोर्ट में भी चुनौती दी जा सकती है इसलिए दोनों पति-पत्नी के नाम को कानून के तहत गोपनीय रखा गया है।

मयंक भार्गव, बैतूल से