मॉर्डन हो चुके हम ?

हम मॉर्डन हो चुके हैं….दक़ियानूसी नहीं रहे अब…..यही तो है अभिजात्य वर्ग….शहरीकरण और नई नौजवान पीढ़ी का पैमाना है ये…..बड़े शहर का बड़ा गुमान है ये…..इसमें ख़ास क्या…ये तो आम है….अपने पुराने ख़यालात बदल दो साहब। शहर नया हो गया है।

रात क़रीब १२ बजकर ४० मिनट का वक़्त…एनआरके बिज़नेस पार्क स्थित अपने ऑफ़िस से निकला ही था। मंगल सिटी मॉल और मेरे दफ़्तर की पार्किंग क़रीब कॉमन ही है। कार के पास पंहुचता इसी बीच २०-२२ साल की एक लड़की बोतल लिए लहराती हुई मेरे क़रीब तक आ पंहुची….मैंने खुद को पीछे खींचा….वो अपनी ही दोस्त को सडक छाप भद्दी गालियाँ दे रही थी। बोतल से घूँट गटकाती, पैरों में पैर फँसाती पार्किंग में लहराती खुले बालों वाली ये लड़की नशे में चूर थी। एक्टिवा पर जैसे-तैसे सवार दोनों लड़कियों ने पास ही पब्लिक टॉयलेट पर

ब्रेक मार दिया। एक दूसरे पर झूमती गिरती लड़कियाँ ज़मीन पर ही गड्डमड्ड होती रही। अपनी कार की तरफ़ बढ़ा ही था कि सिगरेट के कश लेता लड़का उनसे उलझता दिखाई दिया। कुछ ज़ोर आज़माइश हुई। नशे में डूबी लड़कियों ने पत्थर चलाए, बोतल चलाई। नासमझों की तरह मेरे पास खड़े एक शख़्स ने पुलिस को फ़ोन मिला दिया। जवाब मिला- इन्हें कौन रोक सकता है भाई। जाने दो, क्यों खामखां वक़्त बर्बाद कर रहे हो। रोज़ का तमाशा है ये तो। अचानक फ़र्राटे की आवाज़ आई और लड़कियाँ फूर्र हो गई।
शीईईई…..यही तो मॉर्डन होने की निशानी है। मॉर्डन हो चुके हैं हम।

पुष्पेंद्र वैध