मीडिया के नेपथ्य में सरकारी तोते की आवाज़…!

अब समय आ गया है कि देश में प्रेस की आजादी की लडाई शुरु हो

अमेरिका मे डोनाल्ड ट्रंप खुले तौर पर कह रहे हैं कि मीडिया दुश्मन है। भारत में सरकार खुलकर तो ऐसा नहीं कर रही है लेकिन जो कुछ पर्दे के पीछे हो रहा है, उससे साफ है कि देश के 90 फीसदी मीडिया के नेपथ्य में सरकारी तोते की आवाज सुनाई देने लगी है। इन दिनों जबकि मीडिया कार्पोरेट घरानों के कब्जे में पूरी तरह कसा जा चुका हैं। अब पत्रकार, पत्रकार नहीं बल्कि किसी कार्पोरेट कंपनी में काम करने वाले कर्मचारी की तरह है।

मैंने अपनी आने वाली किताब ‘द ट्रूथ बिहाइंड ऑन एयर’ में लिखा है कि रिएलिटी चेक के नाम पर किस तरह टीवी रिपोर्टर से सरकार के गुणगान वाली रिपोर्ट तैयार करने को कहा जाता है। ऐसी रिपोर्टिंग के दो चेहरे होते हैं। आम लोगों में रिएलिटी चेक के नाम पर भरोसा कायम करना और दूसरी तरफ चापलूसी भरे शो दिखाकर सरकारों को खुश करना। उन्हीं दिनों तहलका ने भी एक ऐसा ही स्टिंग ऑपरेशन किया था, जिसमें मीडिया हाउस बता रहे थे कि वे किस तरह सराकर और एजेंडे के पक्ष में खबरें मैंनेज कर सकते हैं. मुझे एक और किस्सा याद आ रहा है- सरकार के एक बड़े घोटाले की कहानी ऑन एयर होते ही खबर ड्राप करवाने के लिए सरकार के प्रभावशाली लोगों के फोन घनघनाने लगे। मैंने साफ़ मना कर दिया तो कुछ घंटों बाद सीधे दफ्तर से फोन मेरे पासआया। मुझसे कहा गया कि संबंध बनाकर चलना चाहिए और अगले ही बुलेटिन से खबर गायब हो गई।

अब समय आ गया है कि देश में प्रेस की आजादी की लडाई शुरु हो। पत्रकारिता की किताबें कहती हैं- ‘लोकतंत्र में प्रेस की भूमिका हमेशा प्रतिपक्ष की होती है।’ वह हमेशा जनता के पक्ष में बेहतर की उम्मीद से आलोचना को स्वीकार कर मशीनरी की उन खामियों को सुधारता है, जो उस तन्त्र को कमजोर बनाती हैं। इसीलिए मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है। लेकिन इन दिनों भारतीय प्रेस-मीडिया की भूमिका प्रतिपक्ष से सत्तापक्ष की तरह होती जा रही है, हो चुकी है। स्वस्थ्य आलोचना को स्वीकार करना और अपेक्षित सुधार करना अच्छी सरकार की पहचान है। प्रेस को कुचलने का मतलब ‘दाल में कुछ काला है’। क्या सरकार के दावों की पोल खोलने या सच्चाई से रु-ब-रु कराने का खामियाजा पत्रकारों को नौकरी से हाथ धोकर भुगतना होगा। जरा सोचिए, कार्पोरेट मीडिया के इस दौर में जब बडे-बडे पत्रकार दबोचे जा रहे हैं तो छोटे लोगों की क्या बिसात।

आज भी कई लोग मीडिया में आकर जस्टिस की उम्मीद लगाते हैं। ‘फ्री प्रेस’ यानी प्रेस को आजाद कराने के लिए लोगों और पत्रकार संगठनों को अब ज़मीन पर आकर लडाई लडना होगी। हर नागरिक को अब सिटिजन जर्नलिज्म करना होगा। खामियों को उजागर करना होगा। सरकार को धैर्य और सामर्थ्य रखकर खामियों को ठीक करना होगा। हर सरकारें मीडिया से सबक लेकर बेहतर की तरफ बढती है. खामियों को ढांक कर लीपापोती और लिखने वालों को देशद्रोही कहने से देश की दूसरी तस्वीर सामने ही नही आ सकेगी और हम एक छद्म दुनिया में ही जीते रहेंगे। अब वक्त है देश के 90 फीसदी गोदी मीडिया बनाम कार्पोरेट मीडिया से हटकर असल पत्रकारों की आजादी और आजाद प्रेस की लडाई में आगे आने का।

सीनियर रिपोर्टर पुष्पेंद्र वैध की रिपोर्ट