महेंद्र की कलम से .. ये भाजपा से है असली बगावत या फिर घुसपैठ है विरोधी खेमे में ?

 

एक बढ़त साधारण सा शेर है जिसे हर उम्र वर्ग के लोग सालों से सुनते और कहते  आ रहे है और शायद ये शेर आम बोलचाल की भाषा का हिस्सा भी बन गया है शेर कुछ ऐसा है ” हमें तो अपनों ने लूटा गैरों में कहाँ दम था मेरी कस्ती वहां डूबी जहाँ पानी काम था ” अर्थ हर कोई बहुत सहज तरीके से समझ चुका होगा / पर यहाँ इस शेर की क्या जरुरत आन पडी तो ये सवाल आपके मन में उठ रहा होगा तो बताना जरुरी है की इन  दिनों कुछ इन्ही हालातों के दौर से बुंदेलखंड की राजनीति के शेर भी गुजर रहे है / एक दो शेर नहीं बल्कि  चार चार शेरों के ऊपर राजनीतिक संकट के बदल छाये हुए है / इस इलाके में सूबे के तीन कद्दावर मंत्री और एक पूर्व केंद्रीय मंत्री के साथ सांसद पर कुछ ख़ास निशाना बनाकर प्रहार हो रहे है / साल चुनाव का है और इस साल हुई चुनावी शुरुवात आने वाले दो सालों तक चुनाव ही चुनाव दिखाएगी / तब अपने परायों को लेकर हो रही खींचतान कई इशारे कर रही है / इलाके के मंत्री पंचायत मंत्री गोपाल भार्गव , वित्त मंत्री जयंत मलैया , गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह और दमोह सांसद प्रह्लाद पटेल को घेरने की मुहीम असर दिखा रही है / इस बार कांग्रेस ने खुलकर नहीं बल्कि बेकडोर कोशिश की है और बहाना बना हार्दिक / जी हाँ हार्दिक , हार्दिक पटेल के बहाने बहुत तरीके से घेरने की कवायद शुरू हुई तो लोगों को हैरानी भी है और नेताओं के सामने बड़े सवाल भी की आखिर सत्ता के नजदीक रहने के साथ वो घर क्यों नहीं संभाल पाए ?

ये चिंता आसान नहीं बल्कि इस बार भाजपा और संघ दोनों में इन नुमाइंदों को लेकर नाराजगी है / शायद तभी चुनाव में आधा साल बचने के पहले ही अपने ही विरोधी बन रहे है / दरअसल मुझ जैसे पत्रकार का माथा उस वक़्त ठनका जब सागर जिले के गढ़ाकोटा में पहुंचे पाटीदार नेता हार्दिक पटेल की सभा में जाना हुआ / हार्दिक के आने में वक़्त था लेकिन जो लोग मंच और उसके आसपास दिखाई दे रहे थे वो सहज और साधारण नहीं थी बल्कि बुंदेलखंड में भाजपा के कद्दावर लोग थे / सबसे  पहले बात हुई दमोह सांसद प्रह्लाद पटेल के प्रतिनिधि कमलेश साहू से … कमलेश छात्र जीवन से लेकर संघ तक और फिर भाजपा के लिए समर्पित कार्यकर्ता रहे है और जिम्मेदार पद पर भी लेकिन अचानक से उन्हें उनके क्षेत्र के विधायक और मंत्री गोपाल भार्गव का विरोधी मान लिया गया और खुद कमलेश बताते है की उन्हें बिना किसी कारण के पार्टी से निलंबित कर दिया गया मतलब बाहर का रास्ता दिखा

दिया गया और उनके पास हार्दिक का सहारा एक मात्र विकल्प था ताकि किसानो की बात वो रख सकें और एक बड़ा गढ़ सरकार के खिलाफ वाले पाले में चला गया / कुछ देर बाद एक और चेहरा दिखता है जिसे भाजपा जैसे संघठन ने बहुत सम्मान दिया लेकिन उस चेहरे को भी भाजपा रास नहीं आ रही / नाम प्रदुम्न सिंह मुन्ना … प्रदुम्न कृषि उपज मंडी के अध्यक्ष रहे है भाजपा की राजनीती में जानामाना नाम है लेकिन किसानो की आड़ लेकर वो भाजपा शिवराज और मोदी तीनो को कोस रहे है तो फिर मंत्रियों की बखत कहाँ ? प्रदुम्न को किसानो की चिंता है ये उनका कहना है और इस चिंता ने उन्हें हार्दिक  के करीब लाया और इस नजदीकी के  लिए वो भाजपा सरकार को भाजपा में रहते हुए ही उखाड़ फेंकना चाहते है और साफ़ कह रहे है की उनके लिए इस बार दल जरुरी नहीं है बल्कि किसान / इस सब से अलहदा एक चेहरा देखकर आश्चर्य जरूर होता है और कहीं ना कहीं सोचने पर भी मजबूर की जिस वर्ग के लोग किसी भी हाल में भाजपा का बुरा नहीं चाहते वो भी सरकार को उखाड़ फेंकने जैसी दलीलें दे रहे है / कभी दमोह जिले के राष्ट्रीय स्वयंम सेवक संघ के कार्यवाहक रहे और फिर संघ की समरसता समिति के प्रदेश पदाधिकारी जैसे दायित्व

सँभालने वाले बहादुर सिंह जिन्हे इलाके के लोग बहादुर मासाब के नाम से जानते है वो भी हार्दिक को गोद में बैठाये है / मासाब की दलील है की वो संघ का ही काम कर रहे है और उन्हें ये करने में कोई परहेज नहीं बस स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों को मोदी लागू कर दें वो ये सब बंद कर देंगे , मतलब साफ़ है की स्वामी नाथन समिति को लेकर संघ परिवार भी चाहता है की मोदी लागू करें और यही मांग हार्दिक की भी है तो मासाब जिसे पुराने लोगों को आज के नए लड़कों को आँखों में बसाना गलत नहीं लगता / ये तो महज तीन नाम है जिनका उल्लेख यहाँ किया गया बल्कि लिस्ट बहुत लम्बी है जो कभी अपने थे पर अब परायों की तरह सलूक कर रहे है और यदि ये सब सच है तो फिर आलम क्या होगा इसकी कल्पना की जा सकती है /

इस सब के बीच हालातों की समीक्षा हम जैसे लोगों को करना जरुरी है लिहाजा यहाँ हालतों की असलियत के करीब पहुंचने की कोशिश हम जरूर करे तो दाल में कुछ काला जरूर लग रहा है और इसे एक साजिश या फिर पार्टी की रणनीति के रूप में भी देखा जा सकता है / गढ़ाकोटा की जिस सभा में हार्दिक के नाम पर एक लाख लोगों के जमा होने के दावे किये जा रहे थे उस सभा में दस हजार का आंकड़ा छूना  भी आयोजकों को मुश्किल लगा / हार्दिक के आने से पहले पंडाल का दस फीसदी हिस्सा भी नहीं भरा लेकिन आने के बाद कुछ राहत जरूर लोगों को मिली / महीने भर से कांग्रेसी विचारधारा के लोग हार्दिक के लिए जबकि जमा रहे थे लेकिन एन वक़्त मंच भाजपा मानसिकता के लोगों के कब्जे में चला गया / और उसका हश्र ये हुआ की हार्दिक के जाते ही कांग्रेसियों का गुस्सा फूटा और वो आपस में भिड़ गए / एक महिला नेत्री का वीडियो सिर्फ दस मिनिट में इस कदर वायरल हुआ की लाखों लोगों ने देखा की वो आयोजन से जुड़े एक कदावर कांग्रेसी नेता को जूते माँरने तक का कह रही है /इलाके के विधायक और सरकार के मंत्री गोपाल भार्गव पर आरोप लगा की उन्होंने आयोजन को विफल करने राशन दुकानों को उसी दिन खुलवाया , ग्राम सभाये उसी दिन कराइ और पानी के टेंकर्स पंचायतों को देने से मना करवाया / लेकिन इन आरोपों के बीच खुद मंत्री भार्गव दिन भर अपने क्षेत्र में कार्यक्रमों में शामिल हुए और हार्दिक के शहर छोड़ने के बाद भी वो अपने मंचो की शोभा बढ़ाते इलाके की समरसता की दुहाई देते रहे / अपने अंदाज में लोगों को बताते रहे की हार्दिक सरदारों के मोहल्ले में सैलून की दूकान खोलने आये है और मजाकिया अंदाज में उन्होंने तो ये तक कह डाला की हार्दिक का चरित्र इस इलाके के लोग जानते है और ऐसे चरित्र के लोगों की बाते उनके क्षेत्र की जनता और मतदाता नहीं सुनते /

लेकिन भार्गव के सामने भी बड़ा सवाल ये है की उनके अपने घर में उनकी पार्टी और संघ दोनों उनके खिलाफ मंच पर क्यों दिखाई दिए ? आखिर क्या वजह है की पार्टी और संघ की तल्खियत मीडिया के सामने भी खुलकर दिखी ? क्या जमीन हाँथ से खिसक रही है क्या बगावत के साथ सुरक्षित माने जाने वाले उनके क्षेत्र में पकड़ कम हुई है या माजरा कुछ और है इस सवाल पर खुद भार्गव कह देते है की संघ और बागी भाजपाई अपनी पार्टी ही नहीं माँ समान पार्टी के साथ अन्याय कर रहे है जिसका खामियाजा भुगतना पडेगा / तल्खियत दोनों तरफ है और कोई भी ये मानने को  तैयार नहीं की गलती किसकी है / इन ताजा तश्वीरों से ना सिर्फ भार्गव जिसे नेताओं को दिक्कत होगी बल्कि इसका असर व्यापक है / हार्दिक की सभा में जिन इलाकों से भीड़ जुटी और जो उनके नुमाइंदे नजर आये उस जद में दमोह विधायक और वित्त मंत्री जयंत मलैया भी आते है / उनके अपने क्षेत्र के कई दिग्गज हार्दिक जिंदाबाद करते नजर आये , मलैया के करीबी हाकम सिंह लोधी दमोह कृषि उपज मंडी के अध्यक्ष प्रतिनिधि गोपाल ठाकुर जैसे चेहरे ख़ास नाम कहे जा सकते है और कही ना कहीं इन चेहरों की नाराजगी मलैया के चुनावी समीकरणों को बिगाड़ सकते है / कुछ ऐसा ही हाल गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह के लिए भी है जब भूपेंद्र समर्थक नेता भी हार्दिक के सुर में सुर मिला रहे थे / इन नेताओं के चुनाव इस साल है लेकिन जिन्हे साल भर बाद जनता के बीच परीक्षा देनी है उनमे दमोह सांसद प्रह्लाद पटेल का नाम अहम् है / राजनीती के जानकार तो यहाँ तक कहते है की ये बिसात मंत्रियों से कहीं ज्यादा सांसद पटेल को घेरने के लिए बिछाई गई है / सासंद पिछड़ा वर्ग से आते है और जब चार साल पहले वो दमोह चुनाव लड़ने आए तो इस वर्ग से ही उनका सामना हुआ लेकिन उनके ओरे ने उन्हें ऐतिहासिक जीत दिलाई लेकिन उनके आभामंडल ने इलाके में पिछड़े वर्ग के नेताओं के ग्लेमर को कमजोर कर दिया और अब उनके खिलाफ उनके ही वर्ग के लोग जाल फैला रहे है /इस बात को आसानी से नहीं लिया जा सकता बल्कि जानकार कहते है की हार्दिक के बहाने ये काम अंदरूनी तौर पर हो रहा है जिसे कराने वालों में परायों से कहीं ज्यादा अपने भी है जिनका प्रभाव कम हुआ या पटेल जैसे नेताओं के आने के बाद उनके यहाँ  दरबारियों की तादात कम हुई / स्वाभाविक है की एक कद्दावर नेता के खिलाफ ऐसी मुहीम चल सकती है जबकि पटेल जैसे नेता से तीन तीन मंत्रियों के साथ कई और दिग्गज भी प्रभावित हो रहे हों तो लाज़मी है की राजनैतिक षड्यंत्र रचे जा सकें और इस रैली या किसान सम्मलेन को इस लिहाज से जोड़कर भी देखा जा सकता है /

पर सवाल ये भी है की क्या ये सब सोची समझी रणनीति का हिस्सा है

? कभी कभी लगता है की सत्ताधारी पक्ष इसे सुनियोजित तरीके से अंजाम दिला रही है जब अपने करीबियों को विरोधियों की फौज में शामिल कराकर सारी योजना को विफल किया जाए

/ हो सकता है की जो लोग बागी बनकर खुलेआम अपनी ही सरकार अपने ही नेता को कोसने में गुरेज नहीं करते वो पहुचाये गए लोग हों और इस सब से विपक्ष की शक्ति को ख़त्म करने में कामयाब हो रहे हों / इन तमाम तथ्यों के मद्देनजर कांग्रेस गुजरात के जिस प्रयोग को एम् पी में करने का सपना देख रही है उस कांग्रेस के पास ये बात विचार करने योग्य है वरना हार्दिक के कथित जादू का सपना महज सपना ही ना रह जाए और पंद्रह सालों का वनवास पांच सालों के लिए और बढ़ जाए और यदि ऐसा कुछ नहीं है तो फिर इलाके के मंत्रियों और सासंद को ज़रा सँभालने की जरुरत है क्योंकि इस बार मुकाबला विरोधियों से कहीं ज्यादा अपनों से होने वाला है /

महेंद्र दुबे दमोह