क्या तल्ख हैं प्रहलाद के तेवर या मामला कुछ और है…

महेंद्र की कलम से ..
मध्यप्रदेश की राजनीति में लंबे समय से एक नाम बेहद सुर्खियों में रह है और इस नाम के साथ कई प्रयोग हुए तो हाशिये पर लाने की कोशिशें भी लेकिन जब जब कोशिशें हुई या प्रयोग हुए ये नाम और ज्यादा सुर्खियां बटोरता गया और शायद यही क्रम आज भी जारी है। नाम है प्रहलाद पटेल . सूबे के हर इलाके के लिए एक चर्चित नाम और इस नाम के आते ही हर सुनने वाला शख्स ऊपर लिखी बात का समर्थन भी करेगा। मौजूदा दमोह से भाजपा सांसद प्रहलाद पटेल एक बार फिर सुर्खियों में हैं और इस बार फिर इन सुर्खियों में आने के बाद लोगों में आम चर्चा है कि ये पटेल की तलखियत है या मामला कुछ और है? इन सवालों का जवाब तलाशते लोग भटक रहे हैं और तरह तरह के कयास लगाने के दौर भी जारी हैं।


दरसल ये सवाल अचानक से खड़े नही हुए बल्कि बीते कुछ सालों में सवालों का पिटारा बहुत बड़ा पर अचानक ही कहें तो प्रदेश और देश की राजनीति में भाजपा के निशाने पर रहने वाले कांग्रेस के नेता और एम पी के पूर्व मुख्य मंत्री दिग्विजय सिंह की नर्मदा यात्रा में उनका स्वागत करने सपत्नीक पहुंचे प्रहलाद पटेल ने सबको सोचने मजबूर कर दिया और दमोह से लेकर भोपाल और दिल्ली तक इस घटनाक्रम की चर्चाएं हैं। इतना ही नही सोशल मीडिया पर खुद पटेल ने इस स्वागत मिलन के फोटो शेयर करके इन बातों को और हवा दी तो आलोचक प्रसंशक और समालोचकों ने भी सोशल मीडिया पर अपनी राय देने में कोताही नही बरती बल्कि पटेल छाए हुए हैं। ऐसेदौर में हम जैसे कलमकारों से भी आम जनमानस के सवालात होते हैं तो लोगों की अपेक्षाएं भी की उनकी जिज्ञासाओं को शांत किया जाए और इसी लिहाज से ये पटेल की तलखियत है या कोई और माजरा इसे तलाशने की कोशिश कर रहा हूँ। शायद इस कलम के चलने के साथ बड़ी तादात में लोगों की जिज्ञासाये पूरी कर सकूं ।


वर्तमान में बुन्देलखण्ड के तीन जिलों को अपना प्रतिनिधित्व देने वाले प्रहलाद पटेल को अमूमन राजनीतिक पंडित खानाबदोश नेता की संज्ञा से विभूषित करते हैं और इसके पीछे की वजह शायद ये भी हैं कि पार्टी ने उनपर तमाम प्रयोग किये हैं और इन प्रयोगों में वो सफल रहे और पार्टी के रणनीतिकार अब भी लगातार प्रयोगवादी बने हैं। में व्यक्तिगत रूप से पटेल से 1998 से परिचित हूँ जब उनके पास नेहरू युवा केन्द्र का दायित्व था तब से लगातार उनके सम्पर्क में रहा और वक़्त के साथ नजदीकियां बढ़ती गई और ये इत्तेफाक ही है कि वो मेरे अपने इलाके से सांसद चुने गए। इस पूरे 20 सालों के दौरान जो अनुभव रहा उसमे खास ये लगा कि वो एक नेता से कहीं अधिक फक्कड़पन की मिशाल के साथ कठोर निर्णय लेनेवाले शख्स और दृण इक्षाशक्ति वाले आधुनिक योद्धा भी कहे जा सकते हैं। राजनीति में जिन तथ्यों से अमूमन नुकसान की सम्भावनाये होती हैं वो दरकिनार कर सिधान्तो से समझौता ना करना उनके स्वभाव का हिस्सा हैं और इन्ही सब कारणों से शायद मौजूदा दौर में उन्हें नुकसान भी झेलना पड़ा हो पर उन्हें नही लगता कि कुछ हुआ है इसी लिए वो सालों पहले जैसे दिखे आज भी वही हैं ये कहना बेमानी नही होगा।


जिस बात को लेकर बात आगे बढ़ी उसमे दिग्विजय सिंह के स्वागत का मुद्दा अहम है तो फोकस उस पर करना जरूरी है लिहाजा अतीत में जाना भी जरूरी है। कई सदियों से ना जाने कितने लोग नर्मदा परिक्रमा करते चले आ रहे हैं और इनकी तादात कितनी होगी ये किसी को बता पाना सम्भव नही है पर बीते कुछ सालों में रेवा को लेकर जिन नामों का जिक्र अक्सर हुआ या कहें कि माँ नर्मदा के प्रति अगाध प्रेम और श्रद्धा वाले शख्स सुर्खियों में आये उनमे दो नामो का उल्लेख जरूर होता है। एक नाम बीते साल दिवंगत हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के कद्दावर नेता स्वर्गीय अनिल माधव दवे और दूसरा नाम प्रहलाद पटेल का है और लोग तो ये भी कहते हैं कि इन नामो से प्रेरित होकर और भी कई राजनेताओं ने जीवनदायिनी माँ नर्मदा के प्रति अपनी श्रद्धा और बड़ाई और अब तो नर्मदा परिक्रमा का दौर बेहद तेज हुआ है। श्री अनिल दवे ने अपनी आस्था अनुरूप जीवन भर नर्मदा के प्रति श्रद्धा बरकार रखी तो प्रहलाद पटेल का जीवन भी रेवा को समर्पित दिखा । खुद नर्मदा परिक्रमा कर नर्मदा की सफाई अभियान में हिस्सेदारी का अनुकरणीय योगदान देने के साथ उन्होंने हजारों लोगों को इस बात के लिए प्रेरित किया कि नर्मदा के घाट और जल दोनों पवित्र रहें और उनकी कोशिशें कामयाब भी हुई और अब तो सूबे की सरकार भी जागी है और जैसी भी हो जिस रूप में हो मुख़्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी नर्मदा यात्रा की और लोगों में ये विश्वास जगाने की कोशिश की की सरकार नर्मदा को लेकर संजीदा है और इस संजीदगी का कितना असर दिखता है ये वक्त बताएगा लेकिन सी एम की नर्मदा यात्रा के बाद पूर्व मुख्य्मंत्री दिग्विजय सिंह की सपत्नीक नर्मदा परिक्रमा ने सूबे में राजनीतिक सरगर्मियां बड़ा दी। इस बीच प्रहलाद पटेल का दिग्गी राजा का सिवनी में स्वागत करना चर्चाओं में आया तो उसके पीछे का ध्येय मेरी नजर में सिर्फ एक परिक्रमावासी का सम्मान है। मान्यताओं के मुताबिक पवित्र नर्मदा की परिक्रमा करने वाले भक्त या श्रद्धालु का सत्कार करना भी नर्मदा परिक्रमा में शामिल होने के बराबर है लिहाजा वो आम हो या खास रेवा को मानने वाले लोग परिक्रमावासी को एक दृष्टि से देखते हैं और जो पूर्व में परिक्रमा कर चुके हुए लोग होते हैं वो उस सम्मान को करने आतुर रहते हैं और प्रहलाद पटेल का दिग्गी राजा का स्वागत इस लिहाज से महज एक परिक्रमावासी का सत्कार मात्र माना जा सकता है। हालांकि ये संस्कार के लिहाज से जोड़कर भी देखा जा सकता है जब पारिवारिक संस्कारों का पालन कर पटेल ने ये अभिनंदन किया हो। कई दफा इस बात को प्रहलाद जी के मुह से सुन चुका हूं कि नर्मदा के प्रति आस्था विश्वास और प्रेम रखने वाला कोई भी शख्स हो उनके लिए वो खास है और सम्मान का पात्र भी और अब जब उन्होंने अपने राजनेतिक विरोधी का सत्कार किया तो उनके द्वारा कही गई बात प्रामाणिक भी हो गई। औऱ पहली नजर में पटेल और दिग्गी राजा की इस भेंट को सिर्फ आस्था का विषय माना जा सकता है।
लेकिन इस सब के बीच ये कोई दो साधारण व्यक्तियों के बीच का मामला नही बल्कि राजनीति के दो विपरीत धुरंधरों का मिलन था ।।अपनी अपनी पार्टियों के दो दिग्गजों की भेंट थी और वो भी उस दौर में जब सूबे में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है और पार्टियां हर दाव खेल रही हैं तब इस मिलन को जनता आसान मान ले ये सम्भव नही है। लोगो का इसे तलखियत मानना लाज़मी है। क्योंकि हर प्रयोग में सफल होने के बाद भी प्रहलाद पटेल के साथ न्याय हुआ इसका जवाब भी लोग पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से चाहते हैं। पार्टी ने उन्हें एक दम नए क्षेत्र दमोह भेजा और चुनावी समर में ऐनवक्त पर उतारा । उस वक़्त में पटेल के पास कुछ शुभचिंतकों और समर्थकों का साथ भर था लेकिन उनके व्यक्तित्व ने चुनावी समर में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और रिकॉर्ड भी बनाया। जबकि उनके संसदीय क्षेत्र के विधानसभा चुनावों के परिणाम उनके चुनाव परिणाम की तुलना में बोने थे और सब ने मान लिया कि व्यक्ति का काम और अतीत कहीं ना कहीं प्रभावी होता है और दमोह संसदीय क्षेत्र में पटेल की लोकप्रियता और काम दोनों दिखाई देने लगे। मोदी सरकार के पिछले मंत्री मंडल विस्तार में आखरी वक़्त तक ये उम्मीद थी कि उन्हें शामिल किया जाएगा लेकिन अंतिम समय उनके नाम पर मुहर नही लगी जबकि पटेल देश के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता अटल बिहारी बाजपेयी जैसे प्रधानमंत्री के मंत्री मंडल में रहकर अपनी काबलियत का लोहा मनवा चुके हैं और अनुभव के आधार पर ये उनका क्लेम भी बनता था पर पार्टी ने नजर अंदाज किया । ये तब हुआ जब पार्टी उनकी क्षमता का पुरा उपयोग मणिपुर जैसे राज्य में कर चुकी है और उन्होंने चौकाने वाले परिणाम पार्टी के सामने रखे। राजनीति के जानकार बताते हैं कि प्रहलाद पटेल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और पी एम मोदी के करीबी और स्नेही भी हैं पर उसके बाद भी उनकी योग्यता और क्षमता को इन बड़े नेताओं ने कैसे नजर अंदाज किया ये बड़ा सवाल है। प्रहलाद पटेल का मध्य प्रदेश की राजनीति में गहरा दखल है और प्रायः हर जिले में समर्थकों की हाजिरी भी है इस लिहाज से कयास लगाये जा रहे हैं कि पार्टी उन्हें एम पी में सक्रिय करेगी पर उनकी सक्रियता कब तक बढ़ेगी इस पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है। ताजा घटनाक्रम के बाद ये कहा जा सकता है कि प्रहलाद पटेल ने दिग्गी राजा का सत्कार करके कहीं ना कहीं अपनी हाजीरी लगाने के साथ संकेत भी दिए हैं कि वो समीकरणों को बनाने बिगाड़ने का काम भी बखूबी जानते हैं। ये तब हुआ जब कुछ दिन पहले ही उनके भाई और गोटेगावँ से विधायक जालम सिंह को शिवराज ने मंत्री मंडल में शामिल कर राज्य मंत्री बनाया और पटेल को साधने का काम किया है। भले ही दिग्गी राजा का स्वागत सत्कार धार्मिक मान्यता या परंपरा का हिस्सा हो लेकिन चुनावी साल में किसी दिग्गज नेता का ये कदम राजनीति में ख़लबली मचाने के लिए पर्याप्त है और शायद इसी लिए पटेल का ये कदम सुर्खियां बटोर रहा है।
अब सवाल यही है कि इतने के बाद भी क्या पार्टी आलाकमान इस तरफ नजर डालेगा जबकि चुनावी साल है और प्रहलाद पटेल महाकौशल के साथ अब बुंदेलखंड में भी प्रभावी भूमिका में हैं। जातिगत समीकरणों के साथ उनका प्रभाव कई विधानभा सीटों पर असर डाल सकता है तो सूबे के दूसरे इलाकों में भी उनकी मजबूत पकड़ है ऐसे में पार्टी का सचेत होना जरूरी है क्योंकि ये चुनाव आसान चुनाव नही है और उस पर किसी प्रभावी नेता की नजरअंदाजी हानिकारक साबित हो सकती है।


महेंद्र दुबे