क्या मध्यप्रदेश की पुलिस भी है मानसिक अवसाद ग्रस्त ?

 

 महेंद्र की कलम से

 एक लाइन में एक वाक्य को पढ़कर आप भी सोच रहे होंगे कि आखिर इस सवाल की जरूरत क्यों आन पड़ी क्योंकि मौजूदा वक्त में पुलिस का अवसाद या तनाव का सवाल अहम नही बल्कि देश मे राजनैतिक मुद्दे प्रदेश में चुनावी साल की सरगर्मी सवालों के साये में है पर ये सवाल उस वक़्त बहुत खास हो जाता है जब पड़ौसी राज्य छत्तीसगढ़ में पुलिस और उनके परिवार सुर्खियों में हैं और शायद ये पहला मौका होगा जब किसी राज्य में उस राज्य के पुलिस परिवारों ने सड़कों पर आकर अपने हक़ के लिए कोई आंदोलन किया है। आंदोलन का सकारात्मक असर ना होकर इस लोकतंत्रात्मक विरोध का खामियाजा पुलिस वालों के साथ उनके परिजनों को भी भोगना पड़ा। आंदोलन कर रहे परिजनों पर मामले बने तो कुछ वर्दीवालों को नोटिस सस्पेंशन जैसी कार्यवाहियों से भी गुजरना पड़ा और तो और सरकार का रुख बता रहा है कि चुनावी साल होने के बाद भी इस वर्ग से सरकार को कोई सहानुभूति नही शायद तभी तो पुलिस वालों के परिजनों की वेदना को सुनने के बजाए पुलिस हेडक्वार्टर ने सम्बंधित जिलो के एस पी को कार्यवाही के निर्देश दिए। लेकिन ये कोई साधारण मामला या आंदोलन नही है बल्कि एक राज्य से शुरू हुआ विरोध का सिलसिला देश व्यापी भी हो सकता है और देश की आवाम को फिलहाल भले ही ये सब सहज लगे लेकिन वर्दीवालों का कदम चिंताजनक हालात पैदा कर सकता है। मध्यप्रदेश में भी छत्तीसगढ़ के आंदोलन की आग फिलहाल चिंगारी के रूप में ही है पर एक चिंगारी ही खतरनाक हो जाती है ये भी लोग जानते हैं। देश में हालात सामान्य रहें इसके लिए सब दुआ करते हैं पर आम नागरिकों की सुरक्षा का दायित्व निभाने वाले खाकी धारी भी मानसिक तनाव से मुक्त रहें ये भी जरूरी है। 

       दरअसल एक खबर नवीस होने के नाते इस गम्भीर मुद्दे पर चर्चा करना अपनी नैतिक जवाबदारी समझता हूं और सच मानिए तो कलम चलाने के पीछे की वजह भी इतनी है कि सूबे में वाकई वर्दी पहने पुलिस के जवान तनाव से भरें हैं शायद तभी इस प्रदेश के जवान जानलेवा कदम भी उठा रहे हैं। आये दिन पुलिस वालों की सुसाइड की खबरें सामने आती हैं, गाहे बगाहे हमारे मीडिया हाउस इन मामलों पर बहस भी छेड़ देते हैं और एक दो दिन चर्चाओं में रहने के बाद पुलिस वालों का दर्द फिर किसी तात्कालिक मुद्दे के सामने बौना पड़ जाता है। छत्तीसगढ़ के आंदोलन और हाल में हुई पुलिस कर्मियों की सुसाइड्स के बाद दिल ने कहा कि इस मुद्दे पर बात होनी चाहिए। वो इसलिये भी की जमाने भर के आंदोलनों प्रदर्शनों को सुरक्षा देने वाले पुलिस महकमे को इस बात की इजाजत नही की वो अपनी मांगों को लेकर आवाज बुलंद कर सकें शायद पुलिस रूल्स  रेग्युलेशन के तहत महकमे के लोग बंधे हुए रहते हैं पर लोकतंत्रात्मक देश मे  समाज के इस  महत्वपूर्ण अंग की आवाज उसकी परेशानी औऱ पीड़ा को उठाना जरूरी है और फिर कहूंगा कि पुलिस राज्य और राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा करती है और जिनसे घर महफूज रहना है उसका तनाव मुक्त होना जरूरी है वरना अवसाद क्या क्या रंग दिखाता है इससे हर कोई परिचित है। यहां स्पष्ट करना  चाहूंगा कि जो कलम चल रही है उसका कतई ये उद्देश्य नही है कि हालात बिगड़ें या इसे पढ़कर किसी नये आंदोलन को हवा मिले बल्कि उद्देश्य सिर्फ इतना है कि इसे पढ़कर जिम्मेदार लोग अर्थात सरकार और प्रशासनिक मशीनरी पुलिस वालों की पीड़ा का एहसास करके उनकी तकलीफों को दूर करें। 

  जिस पत्रकारिता के पेशे से जुड़ा हूँ उस पेशे के लोगों का सम्बंध पुलिस से नजदीक का होता है। महानगरों या बड़े शहरों जिनमे रिपोर्टरों को अलग अलग क्षेत्र की खबरों को कवर करने के लिए नियुक्त किया जाता है उन्हें छोड़ दिया जाए तो छोटे शहरों में पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों को तमाम क्षेत्रों को कवर करना पड़ता है और मौजूदा पत्रकारिता में क्राइम मतलब अपराध एक बड़ा क्षेत्र है और अपराध की खबरों को कवर करते पुलिस और पत्रकार के नजदीकी सम्बन्ध बन जाते हैं और रोजाना पुलिस की पीड़ा से रुबरु होने का मौका भी मिलता है। अक्सर पुलिस वाले बातों ही बातों में कह जाते हैं कि कभी पुलिस की पीड़ा को भी सरकार के सामने रखो । अमूमन पत्रकार पुलिस वालों के इस मश्वरे को टाल जाते हैं और पत्रकारों का जवाब होता है कि बाईट या वर्जन दो दिखा देंगे या छाप देंगे लेकिन ये सुनते ही वर्दीवालों का जवाब होता है हमें ऐसा करने की अनुमति नही है । हां नही है और फिर ख़बर के रूप में उठने वाली आवाज वहीं खत्म हो जाती है । पुलिस की अपनी मजबूरी है कि सार्वजनिक तौर पर बोल नही सकती और मीडिया की अपनी विवशता की बिना बाईट के वो चाह कर भी  पुलिस की इस तरह की खबरों को प्रसारित नहीं कर सकती पर सवाल यही की आखिर इन मजबूरियों के बीच आखिर कब तक वर्दी अवसादग्रसित रहेगी ? 

ये वो दौर है जब छत्तीसगढ़ में पुलिस परिवार आन्दोलन की राह पकड़े हैँ मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों से पुलिस वालों की आत्महत्याओं की खबरें आ रही हैं तब चिंता करना लाज़मी है शायद इन्हीं सब बातों को ध्यान में ऱखकर एम पी के सात जिलों में घूमकर पुलिस की परेशानियों को पता करने की कोशिश की तो हर जगह एक सी समस्याएं सामने आती है और कह सकते हैं कि पूरे प्रदेश में पुलिस वालों को परेशानियां एक सी ही हैं। प्रदेश में इन परेशानियों की मुख्य वजह बल की कमी है मतलब पुलिस थानों में जिस संख्या में विभिन्न रेंक के कर्मचारी अधिकारी तैनात होने चाहिए उससे बहुत कम तैनाती है जबकि हर थाना क्षेत्र में जनसंख्या बड़ी है और अपराधों का ग्राफ भी बड़ा है ऐसे में सीमित बल होने की वजह से पुलिस वालों कई दफा तो बिना आराम किये लगातार 48 से 60 घण्टे तक ड्यटी करनी पड़ती है। पुलिस वाले बताते हैं लगातार दो से तीन दिन तक बिना रेस्ट के ड्यूटी करना कभी कभार की बात नही बल्कि ऐसा महीने में ही तीन से चार बार हो जाता है। नियमो में ड्यूटी की समय सीमा भले तय हो पर ये सब कागजो में सिमटा है । एम पी में साप्ताहिक अवकाश को लेकर मांग उठती रही है तो कुछ सालों पहले तत्कालीन गृह मंत्री बाबूलाल गौर ने साप्ताहिक अवकाश की घोषणा भी की थी पर ये अवकाश तो छोड़िए पुलिस को हर दिन अपनी ड्यूटी के तय समय से कभी दस तो कभी बारह घण्टे ज्यादा काम करना पड़ता है। इन कारणों से पुलिस फोर्स के अधिकांश लोग किसी ना किसी बीमारी से घिरे हैं। जब पता किया जाए तो ब्लड प्रेशर शुगर हाइपर टेंशन मानसिक रोग के साथ असाध्य बीमारियां वर्दीवालों को घेरे हैं। अधिकांश लोग रोजाना इन बीमारियो की वजह से दवाइयों पर निर्भर हो गए हैं तो नोकरी में रहते हुए अपनी जान तक गवा चुके है। कुल मिलाकर कहा जाए तो सूबे की पुलिस बीमार पुलिस बन चुकी है / जिस फिटनेस को देखकर पुलिस की चयन प्रक्रिया होती है आज नौकरी कर रहे पुलिस वालों से वो  फिटनेस शायद बहुत दूर है / बेडौल शरीर चेहरों पर साफ़ झलकती थकान और स्वभाव का चिड़चिड़ापन स्वाभाविक देखने को मिल जाएगा / यकीन मानिये जब वर्दीधारियों से बहुत सुकून से बात करें तो उनकी व्यथा जानकार हैरानी होती है किस तरह से तनाव होगा इस बात का अंदाजा लगाइये जब लम्बी गहरी सांस लेकर पुलिस वाले कह देते  है की इतने परेशां है की सुसाइड करने का मन हो रहा है / 

               इन हालातों के पीछे कारण कुछ और भी है , अधिकाँश क्या बल्कि शत प्रतिशत पुलिस वालों की वेदना यही है की वो परिवार को भी वक़्त नहीं दे पाते , घर में बच्चे पापा का इंतज़ार करते है और सो जाते है पर कई कई दिनों तक बच्चों को पाने पुलिस वाले पापा को देखने का मौका तक नहीं मिल पाता / इन वजहों से पुलिस वालों के परिवार घरेलू कलह के दौर से भी गुजरने को मजबूर हो रहे है और कई ऐसी मामले सामने आते है जब वर्दीवालों के परिवार में विखंडन के हालात बनजाते है /जब देश दुनिया तीज त्योहारों की मस्ती में मस्त रहती है तब खाकी वर्दी पहने पुलिस के जवान किसी सड़क चौराहे पर ड्यूटी बजाते दिख जाएंगे त्योहारों से नाता ख़त्म सा है और इस  नाते के साथ खुशियों से नाता भी ख़त्म सा हो जाता है / पुलिस के जवानो की परेशानियों की एक और ख़ास वजह छुट्टी है … आम लोगों को ये पढ़कर हैरानी होगी की निचले स्तर  के पद पर रहने वाले कर्मचारियों के लिए छुट्टी शब्द बेहद ख़ास है यदि किसी जवान को मनचाहे छुट्टी मिल जाए तो ये उसके लिए किसी उत्सव से कम नहीं है जिसका अंदाजा हम जैसे लोगों को है क्योंकि छुट्टी पर जाते जवान के चेहरे के भाव बता देते है की उसके लिए छुट्टी हासिल करना मतलब जंग में फ़तेह हासिल करने जैसा है / इस बिंदु पर जब पड़ताल की जाये तो अमूमन हर जिले में वर्दीवालों को छुटियों के लिए परेशान होना पड़ता है फिर चाहे किसिस अपने की शादी हो या फिर किसी ख़ास की मैय्यत छुट्टी नसीब नहीं हो पाती और ये बात जवान को तनाव में लाने के लिए काफी है / इस मुद्दे पर जब विवेचना की जाए तो जिन अफसरों के जिम्मे छुट्टी देने का जिम्मा है वो अफसर भी तो इसी दौर से गुजरते है कई अफसर तो कह देते है की छुट्टी की वेदना उन्हें मालूम है लेकिन बल की कमी और काम का बोझ चाह कर भी उन्हें छुट्टी देने की छूट नहीं देता / इसके अलावा बुनियादी सुविधाओं का अभाव भी इस विभाग  के लिए नासूर बनता जा रहा है / लाख दावों के बीच भी प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में पुलिस थानों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव साफ़ देखा जा सकता है / गावों में थाने के भीतर ही पीने का पानी उपलब्ध नहीं है फिर बाकी सुविधाओं के बारे में बात करना ही बेमानी होगा / हालांकि बीते सालों में सरकार और पुलिस विभाग ने इन हालातों से निपटने के लिए कुछ कोशिशें जरूर की लेकिन वो पर्याप्त नहीं है , पुलिस हाउसिंग स्कीम के तहत क्वाटर्स बनवाये गए पर पर्याप्त नहीं और ये प्रक्रिया चल रही है कुछ सालों में शायद बल के आधार पर रहने के लिए मकान भी बन जाएँ लेकिन इतने वक़्त में पुलिस वालों पर क्या बीतेगी इसका अंदाजा लगाइये / मूलभूत सुविधाओं से महरूम वर्दीवालों की परेशानियां बहुत है और शायद विभाग के आला अफसरों और सरकार दोनों को इनकी जानकारी भी है और कह सकते है की आम आवाम को शायद इन सब बातों से सरोकार ना हो पर सोचिये की इसका सीधा सरोकार आम जनता से ही है / कुछ  पल के लिए ये भी सोचिये की हमारे देश में यदि पुलिस शब्द ना हो या पुलिस को समाज की व्यवस्था से अलग कर दिया जाये तो क्या होगा …  मारकाट चोरी डकैती लूट बलात्कार मारपीट जिअसे अपराधों को रोकने वाला कोई नहीं होगा तो क्या देश और समाज चल पायेगा ? और ये मानना होगा की पुलिस का सीधा सम्बन्ध आम आवाम से है और जितना उत्तरदायित्व समाज की सुरक्षा को लेकर पुलिस का है उतना ही समाज का पुलिस के प्रति भी इसलिए ये आलेख आम जनता के लिए भी ख़ास बन जाता है शायद इसे पढ़कर आम नागरिक सरकार तक अपनी आवाज में पुलिस की परेशानी  पहुंचाने में कामयाब हो /

                  साहित्य का एक शब्द निरीह शायद पुलिस के मौजूदा हालातों पर एक दम फिट बैठता है / पुलिस को समाज के लिए बेहद कठिन सख्त दिखाई देती है असल में निरीह है और उसकी निरीहता की बयानी नहीं हो पाती लेकिन वक़्त चिंतन करने के साथ सार्थक कदम उठाने का है / आंदोलन और उससे उठने वाली आवाजे सरकार को दबाना आसान है क्योंकि सत्ता का आदेश मानना शायद पुलिस महकमे की मजबूरी है / छत्तीसगढ़ में पुलिस परिवारों की आवाज को दबाने के लिए जो किया गया वो इसका उदाहरण हो सकता है पर कहीं ना कहीं ये लोकतंत्र में जायज नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि अपने हक़ के लिए सरकार के सामने आवाज बुलंद करने का अधिकार आम नागरिकों को है और पुलिस वालो के परिजन भी इसी आम आवाम का हिस्सा है फिर देश में मानवाधिकार को लेकर भी हो हल्ला होता है और ये मानवाधिकार पुलिस वालों के परिजनों पर भी लागू होते है पर सरकार जो चाहे होता है और हो भी रहा है / शायद सरकारों को पुलिस की वेदना का एहसास ना हो पर छत्तीसगढ़ में जिन अफसरों ने अपने मातहतों पर कार्यवाही की आफ द रिकार्ड उनसे पूँछिये तो वो खुद अपने मातहतों की परेशानियों और उनकी वेदना से परिचित है और खुद जब उन पर कार्यवाही  कर रहे होंगे तो उनका दिल जरूर रोया होगा / कमोवेश हालात मध्यप्रदेश में भी ठीक नहीं है और कहीं ना कहीं एक राज्य से शुरू हुआ आंदोलन का सिलसिलसिला आगे बढ़ सकता है इसका अंदाजा प्रदेश की सरकार और इंटेलीजेंस ब्यूरो को भी है और इस मुद्दे पर सरकार सतर्क है पर सवाल ये भी है की जब अंदाजा हो रहा है तो किसी आंदोलन के पहले ही समस्या का समाधान क्यों नहीं हो जाता / पुलिस वालों को जो परेशानियां है उन्हें लिखने बैठा जाए तो शायद कई पन्ने भर जाएंगे पर मोटे तौर पर इन परेशानियों में सारी कहानी को समेटने की कोशिश की है और इस उम्मीद के साथ की शायद सरकार वक़्त रहते चेत जाए / सरकार को सविधाओं के लिए भारी भरकम बजट की जरुरत पड़ेगी ये भी सच है और आनन् फानन में ये सब कुछ संभव नहीं है इस बात को भी माना जा सकता है पर प्रक्रिया शुरू हो तो साल दो साल में हालातों पर काबू पाया जा सकता है पर मौजूदा सिस्टम को सुधारने की कवायद शुरू हो तो महीने भर में ही हालातों के सुधार की गुंजाइश जरूर दिखाई देती है / 

                अच्छे दिनों के मन्त्र के साथ देश आगे बढ़ रहा है वाकई देश बदल रहा है और इस बदलाव की बयार के बीच आंतरिक सुरक्षा का जिम्मा लिए पुलिस वालों के हालात भी बदलने चाहिए / अक्सर जब पुलिस की परेशानियों को लेकर बातें होती है या किसी मंच से कोई कविता पढ़ी जाती है तो लोग तालिया बजाते है उनके सामने पुलिस का चरित्र उसका कामकाज और पारिवारिक परेशानियां दिखाई देने लगती है मन पसीजता भी है लेकिन जरा से वक़्त के बाद लोग सब भूल जाते है लेकिन पुलिस अपने कर्त्वय को करना नहीं  भूलती और इस कर्त्वय पथ पर चलते हुए रोजाना घर और बाहर की परेशानियां झेलते जवान मानसिक अवसाद और बीमारियों से ग्रसित हो रहे है और इस सब के बीच उम्मीद सरकार से ही है की इन वर्दीवालों के भी दिन अच्छे हो देश के साथ इनका जीवन स्तर भी बदले और हमारी पुलिस पूरी मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी कर सके / हाँ वर्दीवाले कोई मुहीम या आंदोलन नहीं कर सकते शायद आवाम भी इनके लिए कोई प्रदर्शन ना करे पर हम जो कर सकते है वो तो करिये … गुजारिश करूंगा की एक पत्र आप भी मुख्यमंत्री के लिए लिखिए और अपनी पुलिस की परेशानियों से  अवगत करते हुए समस्या के समाधान की मांग कीजिये / सोशल मीडिया का इस्तेमल करते हुए फेसबुक वाट्सअप और ट्वीटर पर ट्वीट कीजिये और सी एम्  को टेग कर उनसे अपील कीजिये की सुविधाओं के विकास के साथ सिस्टम को दुरुस्त  कराएं ताकि पुलिस तनाव से मुक्त हो सके आत्मघाती कदम उठाने मजबूर ना हो और गंभीर बीमारियों से भी बच सके / आप चाहें तो इस आलेख को भी शेयर करें ताकि व्यापक लोगों तक बायत पहुचे और पुलिस के हालात ही ना बदले बल्कि हमारी आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था ठीक हो / ये राजनीति का हिस्सा नहीं बल्कि समाज के एक अभिन्न अंग के लिए शान्ति पूर्वक होने वाला शानत आंदोलन ही है आइयें समाज हित में सहभागी बने ज़रा सा वक़्त अपनी पुलिस को दें .

               महेंद्र दुबे दमोह