काले गोलों से  गुणवत्ता  देखती उच्च शिक्षा ?

दमोह-पथरिया —  अभी कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश राज्य लोक सेवा आयोग ने सहायक प्राध्यापक भर्ती परीक्षा आयोजित की और सिर्फ दो सौ वस्तुनिष्ठ प्रश्न के उत्तर प्राप्त कर चयन सूची जारी की, तो सोचा पाठकों से इस संदर्भ में विमर्श हो।
 वैसे तो प्राचीन काल से अलग अलग क्षेत्रों में, योग्य उम्मीदवार के चयन के तरीके अलग व कहीं-कहीं कठिन भी होते आए हैं। आज के वैज्ञानिक युग में भी संस्थाओं की अपनी अपनी चयन प्रक्रिया है।
कुछ दिनों पहले सुना था कि ग्रुप ”डी” के चयन में साक्षत्कार समाप्त कर दिया जाए, बात ठीक भी है।

पर सिन पाओ येंग के अनुसार “साक्षात्कार क्षेत्रीय कार्य की एक ऐसी प्रविधि है जो कि एक व्यक्ति या व्यक्तियों के व्यवहार की निगरानी करने कथनों को अंकित करने व सामाजिक या सामूहिक अंतर्क्रिया के वास्तविक परिणामों का निरीक्षण करने, के लिए प्रयोग में ली जाती है”।
साक्षात्कार प्रक्रिया के पक्ष- विपक्ष दोनों तरह के तर्क होने के बावजूद भी, महसूस होता है कि, साक्षात्कार प्रक्रिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। खासकर उन क्षेत्रों में जहां ज्ञान को व्यक्त करना पड़ता है
 यह जरूरी नहीं कि सब के पास हर तरह का हुनर हो और यह भी जरूरी नहीं कि हुनर सबके पास हो।
इस परीक्षा में एकाएक साक्षत्कार को अलग करना आश्चर्यजनक लगता है। माना कि जिसने किताबों का अध्ययन कर सब कंठस्थ  कर लिया और जब वे ही प्रश्न आए तो पलटी कर दी।
परंतु कई बार यह होता है कि व्यक्त करते समय कठस्थ वाला हुनर काम नहीं आता है। देखने में यह आया है कि भीड़ के सामने बोलने का साहस,अभ्यास के बाद भी नहीं आ पाता है। उच्च शिक्षा इसका आकलन कैसे करेगा, कि चयनित व्यक्ति विषय को समझाना भी जानता है  कुछ दिनों पहले यह बात भी सामने आई है कि अधिकांश महाविद्यालय गुणवत्ता  विहीन है तो क्या यह जानने की आवश्यकता नहीं है कि सुधार कहां कहां जरूरी है जमीनी स्तर पर आकलन करें तो वस्तुस्थिति सामने आ सकती है। अगर शिक्षक प्रयास कर रहे होते तो रिसर्च का स्तर कुछ और ही होता, प्रदेश में महाविद्यालयों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पर गुणवत्ता कहीं दिखाई नहीं दे रही है। डिग्रीधारी बेरोजगारों की संख्या जरूर बढ़ गई है। महाविद्यालयो के परिसर में भीड़ होती है। पर कक्षाएं सुनी, जब अभी यह हाल है तो क्या हमें आगे के लिए चिंतन नहीं करना चाहिए या वही पुराने चलन को आगे बढ़ाना चाहिए ?
आज स्मार्ट कक्षाएं वर्चुअल कक्षाओं का दौर है तो क्या हर शिक्षक सब को संबोधित करने की हिम्मत रख पाएगा, यह सिर्फ बैठकर डिग्री व उर्तीण

 परीक्षा का दम भरेगा या नैक के मूल्यांकन के समय आगे की कुर्सी पर होगा या पीछे की कुर्सी पर या इग्लिश भाषा का ज्ञान न होने से सामने ही न आये देखने मैं तो यह भी आया है कि जिस महाविद्यालय में छात्र ने 3 वर्ष बताये उसके बाद भी वह अपने रुचिकर विषय से स्नाकोत्तर उपाधि नहीं लेता, कारण विषय के प्रति जिज्ञासा व रुचि पैदा करने वाले का ना होना।
आपसी वार्तालाप बहुत सी शंकाओं का समाधान करता है ऐसी क्षेत्रों में तो यह और भी आवश्यक है।

प्रबल सोनी