अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस, निरक्षर होने पर भी बेटे को बनाया अफसर

40 साल संघर्ष का सफर, अब नाती पोतो के साथ बीत रहा समय

कहते है वक्त सदैव करवट लेता है, संकल्प के आगे विकल्प नहीं टिक पाता है। ऐसी ही कुछ कहानी है नगर की 93 वर्षीय भागवती देवी खटीक की। जिन्होने देश की आजादी के साथ ही संघर्ष प्रारंभ किया था। भागवती देवी कच्चे मकान की दीवार की ओट में बैठकर बीड़ी बनाकर परिवार का पालन पोषण करती। लगभग 40 साल तक जीवन के कठिन समय बिताने के साथ उन्होने अपनी तीन बेटियों का विवाह किया, दो बेटो की पढाई कराई। जेष्ठ पुत्र प्रकाश् चन्द्र खटीक को 1982 में शिक्षक बनाया तो छोटे पुत्र विनोद खटीक को पीएससी में चयन होने पर आबकारी निरीक्षक बनाया जो वर्तमान में विदिशा जिला के आबकारी अधिकारी है।

साथ ही नगर के मध्य स्वयं के नाम पर भागवती देवी शिक्षण संस्थान चला रही है। संस्थान के संचालक नाती रत्नेश् खटीक ने बताया कि दादी के बारे में सभी बताते है, वे अपने बेटो के साथ अपने आसपास के बच्चों को भी स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करती थी। संस्थान में आज भी गरीब छात्रों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। स्वयं निरक्षर होने के बाबजूद भी शिक्षा के क्षेत्र में उनका विशेष लगाव होने के कारण ही शिक्षण संस्थान प्रारंभ किया गया है। राष्ट्रीय पर्व पर उन्ही के द्वारा ध्वजा रोहण किया जाता है। दादी फाइलें भी पलटकर देखती है, छात्रों के अभिभावकों द्वारा कही जाने वाली बातों को गौर से सुनती है।

श्रीमती भागवती देवी ने अपने जीवन के बारे में बताते हुए कहा कि पांच छै के दशक में एक हजार बीड़ी बनाने पर मात्र पांच से दस रूपया साप्ताहिक मिला करता था। घर खर्च के बाद पैसा बचाना मुस्किल होता था। जैसे तैसे पैसा बचाकर बेटियों का विवाह किया, दोनों बेटों की पढाई कराई। बेटा भी पढाई के साथ घर खर्च के हाथ बटाने लगे थे। धीरे धीरे खेती की जमीन भी खरीदी। पढाई उपरांत एक शिक्षक तो एक अफसर। अब तो समय तीर्थ यात्रा में जाता है, चारों धाम की तीर्थ कर लिये है, नाती पोतों के साथ समय व्यतीत होता है।

 

उन्होने नई पीढी को संदेश देते हुए कहा कि आज बहुएं घर में पैर रखते ही विचलित हो जाती है, वक्त से समझौता उसे मानने को तैयार नहीं, जो संघर्ष की कहानी हमारे जीवन की है, लगभग अधिकांश् घरों की भी वही कहानी है, बुजुर्गो के साथ बैठे तो पता चले कि उन्होने कैसे समय बिताया, आज सारे संसाधन है तो कैसे एकत्रित हुए। जिसका का जितना संघर्ष रहा है उतना उसे सुख भी प्राप्त होता है।

मॉ तुझे सलाम

संजय जैन, हटा