आखिर क्यों  चुनाव से पहले विधायकों से नाराजगी सामने दिखाने लगे भाजपाई ?

 महेंद्र की कलम से

   वसुधेव कुटुंबकम …अर्थात  सम्पूर्ण वसुधा हमारा कुटुंब है और इसी मन्त्र को आत्मसात करते हुए अनादि काल से भारत का मानव समाज अपना जीवन जीता चला रहा है , धार्मिक आयोजनों में विश्व के कल्याण की कामना की जाती है तो धर्म ग्रन्थ भी यही सन्देश देते है की  सम्पुर्ण विश्व और पृथ्वी परिवार ही है / देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी वसुधेव कुटुम्कम मन्त्र का जिक्र करके दुनिया के सामने सन्देश देते है पर मोदी की अपनी पार्टी यानी भाजपा में वसुधा के उस हिस्से के लोगों को नापसंद किया जा रहा है जो हिस्सा सम्बंधित विधानसभा क्षेत्र का नहीं और उस हिस्से से उनके हिस्से में आकर चुनाव लड़ने वालों के खिलाफ अब जमीनी मुहीम भी शुरू हो चली है और कहा जा सकता है की चुनावी बिगुल बजने से पहले ही मोदी के उस मिथक को तोड़ने का काम भाजपा कार्यकर्ता कर रहे है जिसमे वसुधा को कुटुंब कह कर मोदी दुनिया के सामने बड़े बनते है / सरल सहज शब्दों में कहा जाये तो बाहरी उम्मीदवारों के खिलाफ अब भाजपा के नेता और कार्यकर्ता लामबद्ध हो रहे है और चौथी दफा सत्ता के गलियारों पर कब्जा करने की कोशिश में लगे सूबे के मुखिया शिवराज सिंह चौहान और उनके दल की मुहीम को शायद झटका  भी लगे / आज कलम को इसी मुद्दे पर चलाना लाज़मी समझूंगा क्योंकि बारिश के मौसम में गरमी की चपेट में रहने वाले एम् पी के शहरों और गावों में चुनावी सरगर्मी भी शबाब पर आने की तैयारी में है या कहें की चुनावों की तारीखें आने में वक़्त है लेकिन बिसात बिछाए जाने का काम जारी है /

                     बीते पंद्रह सालों की सत्ता संचालन करने के बाद प्रदेश में भा

जपा को घेरने की पूरी कोशिशें कांग्रेस कर रही है तो कांग्रेस ने बड़ा दाव खेलकर वरिष्ठ नेता कमलनाथ को एम् पी कांग्रेस की कमान सौंपी , कमलनाथ ने कमल के लिए ज़रा मुश्किल में जरूर डाला पर हालात बताते है की मौजूदा दौर में सत्ताधारी भाजपा को अपनों से निपटना भी बहुत जरुरी है / ये हालात तब बन रहे है जब सूत्र बताते है की आर एस एस यानी संघ के सर्वे में सरकार के विधायकों की स्थिति ठीक नहीं है तो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भी जबलपुर में इशारों इशारों में ये कह दिया की भाजपा के मौजूदा विधायकों में से कइयों के टिकिट कट सकते है और इस फेहरिस्त में शिवराज सरकार के कई कद्दावर मंत्री भी शामिल है / चुनावी साल में ऐसी अटकलें अक्सर लगाईं जाती है लेकिन कई दफा ये अटकलें सच भी होती है और जब अनुमान लगाइये की चौथी बार कुर्सी पर बैठना आसान नहीं है तो देश के दुसरे राज्यों के चुनाव परिंणामो के मद्देजनर पार्टी भी जिताऊ उम्मीदवारों पर दाव लगाएगी तो प्रदेश के नेताओं के लिए ये खबर या अटकल बुरी साबित हो सकती है / सूत्रों के मुताबिक़ एम् पी के महाकौशल बुंदेलखंड और बघेलखण्ड में भाजपा विधायकों के कामकाज से जनता उतनी संतुष्ट नहीं है जितनी चुनावों  के लिए चाहिए और ये असंतुष्टि पार्टी के लिए शुभ संकेत नहीं हो सकते और लाज़मी है की भाजपा का शीर्ष नेतृत्व नेताओं की नजर में कुछ अलोकप्रिय निर्णय भी ले ले तो ये पार्टी के हित में होगा / बात बुंदेलखंड की करें तो संभवतः

शिवराज सरकार के तमाम कद्दावर मंत्री इसी क्षेत्र से आते है / सूबे के वित्त मंत्री जयंत मलैया पंचायत मंत्री गोपाल भार्गव गृह परिवहन मंत्री भूपेंद्र सिंह जेल मंत्री कुसुम महदेले महिलाबाल विकास राज्य मंत्री ललिता यादव जैसे दिग्गज बुंदेलखंड से है तो केंद्र में भी इस इलाके का दखल बराबर है / टीकमगढ़ से सांसद वीरेंद्र खटीक केंद्र में मंत्री है तो दमोह  से सांसद प्रह्लाद पटेल का कद इस लिहाज से भी बड़ा है की वो अटल सरकार में केंद्र में जिम्मा संभाल चुके है और एक बार फिर देश की राजनीती में दखल रखते है तो भले ही वर्तमान समय में पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती उत्तर  प्रदेश से सांसद  चुनकर केंद्र में मंत्री हो पर मूलतः वो टीकमगढ़ की ही है और इस लिहाज से इस अंचल  में कद्दावर भाजपा  नेताओं की कमी नहीं है बावजूद इसके भाजपा के लिए इस इलाके में मुशिकलें दिख रही है / आखिर ऐसा क्या हुआ जिस वजह से  संघ जैसे संघठनो को बारीकी से अध्यन करने के बाद अपनी राय रखनी पडी , संघ ने ऐसा कोई सर्वे किया या नहीं ये स्पष्ट नहीं है लेकिन जिस तरह से इस सर्वे पर मीडिया ट्रायल चला उसे देखकर कहा जा सकता है की कहीं ना कहीं आर एस एस ने कोई रिपोर्ट जरूर दी है शायद तभी प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह ने नागपुर में हाजिरी लगाईं / पर सवाल अब भी यही है की जिस विकास के दावे मुख्यमंत्री और उनके मंत्री करते है , कागजों और आंकड़ों में जिस प्रगति की बात की जाती है आखिर उस विकास और प्रगति के बाद भी नेताओं की छवि पर असर क्यों पड़ा ? आखिर क्यों नेता जनमानस को संतुष्ट नहीं कर पाए और इतने सब के बाद भी जनता क्यों अपने विधायक के लिए खुलकर नहीं बोल पा रही की हाँ हमारा विधायक

बढ़िया है और हम फिर उसी को जिताएंगे / राजनीति के खेल में कोई नेता कितनी भी सफाई दे पर हकीकत यही है की सीट किसी की सुरक्षित नहीं है / बारी बारी से बुंदेलखंड के मंत्रियों की बात करें तो इस अंचल में सबसे सुरक्षित सीट सागर जिले के रहली विधानसभा की मानी जाती है , विपक्षी भी ये कह जाते है की रहली विधायक और मंत्री गोपाल भार्गव को हराना आसान नहीं शायद तभी इतने बार से वो विजय का परचम लहराते आ रहे है लेकिन जो ख़बरें सामने आ रही है उसके मुताबिक उनके इलाके में निर्मित  हुए राजनैतिक समीकरण कुछ शुभ नहीं है और जिस तरह ओ बी सी फ्रंट ने एकजुट होकर हार्दिक पटेल के बहाने उनके क्षेत्र में धावा  बोला उससे बातों का बाजार और गर्म हो गया है / इतना ही नहीं सूत्र बताते है की इस बार भार्गव अपने बेटे युवा नेता अभिषेक भार्गव को भी विरासत के तौर पर राजनीति का मैदान सौंपना चाहते है पर मैदान पूरी तरह से खाली नहीं बल्कि इस बार वो खुद तो चुनाव लड़ेंगे ही साथ ही बेटे के लिए भी टिकिट की मांग करेंगे और अनुमान लगाया जा रहा है की बीते कुछ सालों से बेहद सक्रीय हुए अभिषेक को वो रहली से मैदान में उतारकर खुद देवरी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ सकते है / दूसरी तरफ इसी जिले के खुरई से विधायक प्रदेश

के गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह के लिए भी खुरई सीट आसान नजर नहीं आ रही और वो सागर सीट से भाग्य आजमाना चाहा रहे है और इस बात का अनुमान इस बात से लगाया जा रहा है की कुछ महीने पहले सागर सेविधायक शैलेन्द्र जैन  ने इस बार चुनाव ना लड़ने की इक्षा जाहिर की थी और माना जा रहा है की शायद भूपेंद्र सिंह के लिए शैलेन्द्र ये बलिदान देने तैयार हुए पर राजनीति के मैदान में बलिदान कम ही देखने को मिलते है लिहाजा इसे सिर्फ अटकल ही कहा जाए लेकिन इससे कहीं ना कहीं ये जरूर कागता है की गृह मंत्री को अपनी  चुनावी जमीन खिसकती दिखाई दे रही है / प्रदेश के एकऔर वजनदार मंत्री प्रदेश के कुबेर यानि वित्त मंत्री जयंत मलैया के लिए भी  सीट आसान नजर नहीं आती हालांकि मलैया मंचो और मुलाकातों में अपनी जीत के प्रति पूर्ण आश्वस्त दिखाई देते है पर यहाँ भी सूत्र बताते है की मंत्री मलैया भी अपने बेटे और राजनीति में बीते कुछ सालों से ज्यादा सक्रीय हुए भाजपा नेता सिद्धार्थ मलैया को चुनावी समर में लाना चाहते है / कयास ये  भी लगाए जा रहे है की यदि कहीं पार्टी उम्र का बंधन लागू करती है तो मलैया अपने बेटे या पुत्र वधु के लिए टिकिट दिला सकते है और उनकी राजनैतिक विरासत को वो आगे बढ़ाएंगे / संभाग के पांचो जिलों  में फिलहाल भाजपा का कब्जा है और कमोवेश हालात एक से है और चतुर्थ सरकार निर्माण की राह आसान भी नहीं /

      आवाम की संतुष्टि या नाराजगी से दूर ये कहना गलत नहीं होगा की फिलहाल भाजपा को विपक्षियों से नहीं बल्कि अपनी ही पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं से ख़तरा हो सकता है या नेता और कार्यकर्ता बगावती हो सकते है / अभी तक अंदरूनी तौर पर दिखने वाली नाराजगी अब सार्वजनिक तौर पर देखने को मिलने लगी है और भले ही ये बागी नेता बड़ी सफाई से ये कहें की पार्टी के संघठन को अपनी बात पहुँचाना उनका फर्ज है और केडर बेस भाजपा में कार्यकर्ताओं की सुनी जाते है पर चेहरों पर तल्खियत ये बयान कर देती है की सत्ता का सुख अब निचले स्तर पर काम करने वाला भाजपा का कार्यकर्ता भी लेना चाहता है/ ये तमाम बाते यूँ ही नहीं लिख रहा हूँ बल्कि इस चीज का एहसास नजदीक से करने के बाद कलम चलना शुरू हुई है / बुंदेलखंड में विधायकों के प्रति नाराजगी की चिंगारी पहली दफा सामने देखने को मिली और ये चिंगारी सिर्फ बुंदेलखंड तक सीमित नहीं बल्कि आने वाले दिनों में राजधानी स्थित भाजपा के प्रदेश कार्यालय के प्रदेश के कई अंचलों से विरोध के  स्वरों के साथ वर्तमान विधायकों के खिलाफ मोर्चा खोले भाजपाई देखने को मिलेंगे / इस की शुरुवात दमोह जिले के पथरिया से हुई है / पथरिया के वर्तमान विधायक लखन पटेल के खिलाफ अघोषित रूप से उनकी जाती समाज और पार्टी के बड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मोर्चा खोला / मंगलवार को पथरिया विधानसभा क्षेत्र के तमाम दिग्गज नेताओं ने हटा में एक बैठक का आयोजन किया और सीधे तौर पर विधायक लखन पटेल का विरोध ना करके एक मांग को बुलंद किया की इस बार बाहरी प्रत्याशी नहीं थोपा जाना चाहिए और क्षेत्रीय नेता

में से किसी को टिकिट मिले / इस मांग को उठाने वाले सारे चेहरे वो चेहरे है जिन्हे पथरिया विधानसभा में भाजपा का चेहरा माना जाता है / एक स्वर में  इन नेताओं ने मीडिया के सामने इस बात को कहा की अबकी बार दो सो पार का नारा तभी सच होगा जब पार्टी सोच समझकर स्थानीय कार्यकर्ताओं को टिकटें देंगी / अघोषित विरोधियों की माने तो स्थानीय व्यक्ति के विधायक ना होने से क्षेत्र की समस्याओं का समाधान नही हो पाता और जनता नाराज है / इतना ही नहीं ये नेता साफ कहते है की अब पार्टी में वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की इज्जत भी नहीं है बाहरी लोग आकर चुनाव जिन वरिष्ठ और कनिष्ठ कार्यकर्ताओं की दम पर जीतते है उन कार्यकर्ताओं को पांच सालो तक बेइज्ज्ज़ती सहन करनी पड़ती है और कार्यकर्ताओं के स्वाभिमान पर ठेस पहुंच रही है / इन नेताओं की माने तो इस बार संगठन से आर पार को लड़ाई होगी स्थानीय प्रत्याशी की मांग को मजबूत करने बूथ लेवल पर जाकर बूथ तक के कार्यकर्ता को एकजुट किया जाएगा और फिर भोपाल से लेकर दिल्ली दरबार तक अपनी आवाज को पहुंचाने का काम होगा / ये हालात साफ़ बताते है की लोग मौजूदा विधायक लखन पटेल की कार्यशैली और क्रियाकलापों से संतुष्ट नहीं है / पांच सालों तक कार्यकर्ता घुटन महसूस करता रहा और विहधायक के ओहदे के सामने शांत ही रहा लेकिन अब जब मौका मिला तो अपनी आवाज को बुलंद करने मैदानमे आया है और इस मैदानी जंग के कई परिणाम भी सामने आएंगे /

     इस तरह के हालात सिर्फ पथरिया के नहीं बल्कि कुछ अपवाद छोड़ दिए जाएँ तो खुद भाजपा का कार्यकर्ता अपने अपने विधायकों से नाराज ही है / इस नाराजगी के कई कारण हो सकते है और कई वाजिब भी तो कई गलत भी लेकिन  पार्टी संघठन को इस गंभीर  मसले पर चिंतन जरूर करना चाहिए / जिस तरह के शुरवाती तेवर दिखाई दे रहे है उससे लगता है की आग कई सालों से धधक रही थी लेकिन पार्टी का कार्यकर्ता उसे भड़का नहीं पाया और अब आग की तपन सार्वजनिक हो रही है / क्षेत्रीय प्रत्याशी महज आड़ लगती है क्योंकि भाजपा जिसे पार्टी को क्षेत्रवाद से परे ही देखा गया है / देश से लेकर प्रदेश तक कई उदाहरण है जब अलग अलग इलाकों में बाहरी प्रत्याशियों को भेजा गया / खुद देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मूलतः गुजरात के होने के बाद उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़े तो मध्यप्रदेश में सुषमा स्वराज को चुनाव लड़ाया गया / एम् पी की कद्दावर नेता उमा भारती का तबादला एम् से यू पी किया गया तो खुद दमोह के सांसद प्रह्लाद पटेल बड़ा उदाहरण है जब प्रदेश के कई सीटों से अलग अलग चुनाव लड़ कर उन्हें दमोह में तैनात किया गया और कम समय में पटेल ने खुद को स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी / तो क्षेत्रीय प्रत्याशी का मुद्दा शायद भाजपा जिसे पार्टी के लिए ख़ास नहीं होगा जिसे भाजपा का आम  कार्यकर्ता भी समझता है लेकिन पार्टी के लिए इस बात पर चिंतन जरूर करना पडेगा की लोगों की नाराजगी अब साफ़ दिखने लगी है और ऐसी परिस्थितियों में यदि पार्टी आलाकमान ने कोई ठोस कदम नहीं उठाये तो शायद कुर्सी को बचा पाना मुश्किल हो /

                      महेंद्र दुबे दमोह