सरकार की नींन्द खोलने के लिए क्या घण्टी की जरूरत है ?

महेंद्र की कलम से

सुबह सुबह का वक़्त घर से निकला भी और फिर घर पहुंचने की जल्दी भी क्योंकि एक पारिवारिक मित्र के एक समारोह में शहर से बाहर जाना था लिहाजा सब कुछ बहुत जल्द निपटाने की पड़ी थी और किया भी वही लेकिन रास्ते से निकलते बैंक चौराहे के नजदीक कुछ घण्टियों की आवाजें शायद अपनी तरफ बुला रही थी । ये वही घण्टी जिसकी ध्वनि सुनकर स्कूल में पहुंच जाता था कालखंड के खत्म होने वाली राहत देने वाली ध्वनि और फिर मंदिरों में आस्था का प्रतीक बन चुकी घण्टी की आवाज थी। स्वाभाविक है घण्टी की ध्वनि ने अपनी तरफ खींचा और पहले लगा कि शायद किसी धार्मिक आयोजन का जुलूस या शोभायात्रा होगी दर्शन लाभ ही मिल जाएगा पर ये घण्टी की ध्वनि तो कुछ और ही थी। इस ध्वनि में सियासी करकस्ता सी सुनाई दे रही थी कभी आक्रोश की ध्वनि तो कभी कल की चिंता का कोलाहल और ये सच ही निकला। थोड़ा कदम बड़े तो इस घन्टी को बजा रहा अमूमन हर शख्स स्त्री पुरुष परिचित ही निकला जिनमे से अधिकांशतः लोगो से या तो पुराना नाता है या मित्रवत सम्बन्ध। सहज तौर पर अपनत्व के भाव रखकर बेहिचक पूछ ही लिया कि आखिर सड़क पर इस तरह घण्टियाँ बजाने की जरूरत क्यों आन पड़ी। उनमे से एक मित्र ने बेबाकी से एक वाक्य में जवाब देकर प्रति प्रश्न की तमाम सम्भावनाओ को वही खत्म कर दिया और वो जवाब था ” सरकार की घण्टी बजा रहा हूँ ” .. खबर नवीश होने के नाते मन मे खबर का कीड़ा चल रहा था और इस तरह के प्रदर्शन अक्सर सुर्खिया बटोरते हैं और वो भी तब जब सूबे या देश मे राजनीतिक माहौल गरमाया हो तब खास तौर पर टी वी के लिए ये दृश्य और भी असरकारी होते हैं। मन मे चल रही उहापोह के बीच खबर ने अपना घर बना लिया था कि अचानक इन दृश्यों को कैद करते कुछ साथी दिखे तो हांथ में कैमरा ना होने का मलाल नही रहा। निश्चिन्तता सी आई और कुछ साथियों को खबर का एंगल समझाकर चलता बना लेकिन दिमाग मे खबर ही झूम रही थी पर जल्दबाजी में मन यहां से वहां डोल रहा था। आखिरकार घर की तरफ चला और जाने की तैयारी भी हो गई और मित्रो के साथ होने के बाद भी सवाल मन को कसोटते रहे कि आखिर अचानक से ऐसा क्या हो रहा है जब बीते एकहफ्ते से कुछ हटके दृश्य देखने को मिल रहे है । सवालों का जवाब खुद ही खुद को देता रहा पर सवाल थे कि खत्म नही हो रहे थे। दिल ने सरकार भी चला की और जनता होने की अनुभूति भी कर ली । कुछ देर घण्टी बजाने वालो की परेशानियों का एहसास करके सरकार को भी कोस लिया तो कभी खुद सरकार बनकर अपनी मजबूरियों को भी टटोल लिया पर निष्कर्ष नही निकल रहा था। और इस दुविधापूर्ण स्थिति में सफर जारी था। यहां आपको बता दें कि जिन घण्टियों की ध्वनि ने ये सब सोचने मजबूर किया उन घण्टियों को बजाने वाले मध्य प्रदेश सरकार के विभिन्न विभागों के संविदा कर्मचारी थे। अधिकांश वो महिलाएं और पुरुष जो एक और डेढ़ दशक से सरकारी महकमो को अपनी सेवाएं दे रहे हैं लेकिन सरकार उन्हें सरकारी मुलाज़िम नही मानती और ना ही उनके जैसी सुविधाएं है और ना सुरक्षित भविष्य और इन्ही तमाम बातो को ध्यान में रखकर अपने भविष्य की चिंता करते ये कर्मचारी सड़क पर आकर सरकार का ध्यान आकर्षित कराने इस तरह का प्रदर्शन कर रहे थे कि सरकार उनकी सुन ले और उन्हें परमानेन्ट कर दे। कुछ किलोमीटर का सफर तय हो चुका था तो पडौसी जिले छतरपुर की सीमा में प्रवेश किया पहला ही कस्बा बक्स्वाहा आया तो कुछ कुछ ऐसी ही तशवीर नजरो के सामने दिखी । आशा भरी आवाज में नारे लगाते नोजवान युवक युवतियां तो कुछ अधेड़ उम्र लोग।लंबी रैली की वजह से गाड़ी के पहिये थमे तो यहां भी रहा नही गया। रैली में नारे लगाते एक युवक से पूछा तो उसका जवाब भी झकझोर गया जवाब था हमारी भूल कमल का फूल। युवक मस्खरी के अंदाज में जवाब देकर चलता बना पर माजरा समझ मे आ गया क्योंकि पिछले कुछ दिनों से ये जुमला एम पी में जोर सा पकड़े है। बक्स्वाहा की इस रैली में स्कूलों में पढ़ाने वाले अतिथि शिक्षक थे हाँ दमोह के उन्ही अतिथि शिक्षको की तरह जिन्होंने हफ्ते भर पहले ही सार्वजनिक रूप से सामूहिक शपथ लेकर सरकार के खिलाफ बाकायदा वीडियो बनाया और उसे वायरल किया। खबरिया चैनल्स ने बहुत अलग अलग अंदाज में दिखाया तो अखबारो ने मुख्य पृष्ठ पर जगह दी और ये आग पूरे प्रदेश में फैल गई। अब सोशल मीडिया पर सिर्फ अतिथि शिक्षकों के ही नही बल्कि उन तमाम मुलाजीमो की इस तरह की शपथ के वीडियो दिन भर आ रहे हैं जिन्हें इस चुनावी साल में सरकार की मेहरबानियों की उम्मीद है। ये आशावादी आंदोलन कहा जा सकता है या अवसरवादी भी क्योंकि जिस तरह से ये सब जोर पकड़ा वो शायद इतने सालो में कभी प्रदेश की जनता ने नही देखा। आंदोलन मांगों को लेकर धरना प्रदर्शन तो अक्सर लोगों ने देखे लेकिन विरोध का ये तरीका और उग्र मुखर विरोध लोगों में कौतूहल बना हुआ है। जब प्रदेश भर के लाखों परिवारों को चुनावी साल में आशा है कि सरकार उनकी सुनेगी । इसे दूसरे नजरिये से देखें तो ये अवसरवादिता भी कही जा सकती है क्योंकि ये सब उस वक़्त हो रहा है जब जनता के पास नई सरकार चुनने का मौका है शायद इसलिए सत्ताधारी दल के लोग दबी जुबान से ये कहने से नही चूकते की चुनावी साल में ये ब्लैकमेलिंग का तरीका है। हाँ इसे ब्लैकमेलिंग कहा जा सकता है शायद इसलिए कि लोग अपने पेट की आग बुझाने अपने घर को चलाने और अपने परिवार की गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए ब्लेक मेलिंग का ही सही पर सहारा ले रहे हैं। इसे उनकी मजबुरी भी कहा जा सकता है। सालों पहले पढ़ लिखकर सुनहरे भविष्य के सपने देखने वाले ये सरकार के संविदा कर्मी अतिथि आदी आदि भला चिंतित क्यों ना हो? ये बड़ा सवाल तो है। इन लोगों की दलील पर गौर करें तो वे सरकारी दफ्तरों या संस्थानों में उतना ही काम करते हैं जितना सरकार के स्थायी मुलाज़िम बल्कि कई जगह तो सारी व्यवस्थाएं ही उनके ही भरोसे चल रही हैं। इतना ही नही सरकार ने उन्हें आश्वासन भी दिए कि उनका भविष्य सुरक्षित करेंगे पर वादाखिलाफी हुई और आज बड़ी तादात में लोग ओवर एज हो गए हैं जिनके पास किसी परमानेंट नोकरी में जाने का मौका भी नही बचा। ऐसे में आखिर अपने जीवनको निश्चिन्त होकर चलाने के लिए वो सरकार की तरफ ना देखे तो क्या करे ? दरअसल चुनावी साल में सरकार के पिटारे के खुलने की उम्मीद में इनका आंदोलन तेज होना लाजमी भी है। हम कह सकते हैं कि पूरे प्रदेश में इसी सोच को लेकर लोग सड़क पर आए हैं। प्रदर्शन कर रहे लोगों की अपनी मजबूरी है तो सरकार की अपनी परेशानी। आंकड़े जो दर्शाते हैं उनके मुताबिक प्रदेश सरकार के ऊपर कर्ज का बोझ है और सरकार लाख विज्ञापनों के जरिये खुशहाली और समृद्धि के दावे करे लेकिन सरकार की माली हालत भी ठीक नहीं है ऐसे में एक साथ लाखों कर्मचारियों को स्थायी बनाकर उन्हें सुख सुविधाएं देने पर सरकार पर आर्थिक बोझ कितना ज्यादा होगा शायद तभी हर दिन सड़कों पर झेल रहे विरोध सरकार की किरकिरी के बाद भी सरकार कोई ऐसा सरकारी फरमान जारी नही कर पा रही जिससे उसे अपने अच्छे कल की निश्चिन्तता हो। इस सब के बीच अतीत भी कुछ ठीक नजर नही आता। आंदोलनकारी बार बार मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान को ये याद भी दिलाते हैं कि कर्मचारियों ने ही दिग्विजय सिंह शासन को बाहर का रास्ता दिखाया था और उस वक़्त के मौजूदा हालातों का अध्यन ये कहीं ना कहीं साबित भी करता है की दिग्विजय सरकार को सरकारी महकमे की नाराजगी का शिकार होना पड़ा और उन्होंने जो माहौल बनाया उसने फिजा बिगाड़ दी। अध्ययन ये भी बताता है कि उस वक़्त और आज में अंतर है । सोशल मीडिया का प्रभाव बड़ा है और इसके सकारात्मक और नकारात्मक परिणाम भी सब देख सुन रहे हैं। ऐसे हालातों में सूबे में हालात चिंताजनक ही कहे जाएंगे। बेरोजगारी का आलम किसी से छिपा नही है जब चंद रोज पहले ही महज कोर्ट में प्यून की नोकरी के लिए उच्च शिक्षित एम बी ए और पी एच डी होल्डर्स नोजवानो ने ना सिर्फ आवेदन किया बल्कि कतारों में लगकर साक्षात्कार भी दिए। इस जगह पर आकर उन्हें शायद अपनी पढ़ाई लिखाई पर तरस भी आ रहा होगा और दुख भी पर सवाल जिंदगी चलाने का है तो समझौता करना एक मात्र विकल्प। उस दौर में जो लोग सरकार को सेवाएं दे रहे हैं उनका हक तो बनता है कि सरकार उनका ख्याल रखे और इस लिहाज से उनकी मांगों को मजबूती मिल रही है। सड़को पर बज रही घण्टियाँ कई संकेत भी कर रही है। मसलन आर्थिक कमजोरी सरकार की परफार्मेंस को कटघरे में खड़ा किये जो कर्ज के बोझ के तले दबती गई लेकिन आर्थिक विकास की तरफ कोई ठोस कदम नही उठा पाई। सरकार की फोकट वाली कथित योजनाएं भी जिम्मेदार कही जा सकती हैं जिनकी वजह से सरकार का पैसा पानी की तरह बहा पर परिणाम सिफर रहे। बेहतर होता कि इन योजनाओं से उलट सरकार रोजगार के साधन तैयार करती। उद्योग धंधों का विस्तारीकरण होता तो आर्थिक संपन्नता बढ़ती और हालत बेहतर बनते पर वोट बैंक की चाहत ने मुफ्त की योजनाओं को बल दिया पर कभी सोचा गया कि इससे प्रदेश का कितना नुकसान हुआ ? जिन के सर पर परिवार का बोझ है वो संविदाकर्मी घण्टी ना बजाए तो क्या करे ? जिसने अरमानों के साथ पढ़ाई लिखाई की हो और नतीजा बेरोजगारी मिला हो वो जिम्मेदारों को क्यों ना कोसे ? इस सियासी दौर में क्या वाकई घण्टी की आवाज से सरकार की नींन्द खुलेगी ? क्या सामूहिक शपथ का असर होगा? और क्या सरकार चेतेगी ? मैने तो इस दर्द का एहसास कर लिया जितना कर सकता था या सामर्थ्य है अपनी कलम के जरिये घण्टी बजाने का काम किया पर क्या सरकार अपना फर्ज निभाएगी ? और क्या आप जागरूक लोग तख्ता पलट करने नही बल्कि आशावादी इन कर्मचारियों के हक़ के लिए अपना समर्थन देंगे ?
महेंद्र दुबे दमोह