दमोह की घटना यह तो क्रूरता की इंतिहा है माननीय

दमोह की घटना
यह तो क्रूरता की इंतिहा है माननीय
अतिथियों का ज्ञापन नहीं लेना था, मत लेते। बात नहीं सुननी थी, नहीं सुनते। नियमित नहीं करना है, मत करो। वेतन नहीं देना है, मत दो। नौकरी से निकालना है, निकाल दो, लेकिन जनता को तो उनके खिलाफ मत खड़ा करो। यह कम तो अंग्रेजी हुकूमतों ने भी नहीं किया। अब तक आप सभा में लोगों से हाथ अपनी प्रशंसा में उठवाते रहे हो, लेकिन दमोह में तो आपने अतिथि शिक्षकों को हजारों लोगों की भीड़ में जलील करते हुए उन्हें नौकरी से निकालने की सहमति के लिए लोगों से हाथ उठवा लिए। भीड़ तो भीड़ होती है, उससे कुछ भी करवाया जा सकता है।खेर अभी तक भीड़ को उकसाने का कार्य कुछ राजनीतिक संरक्षण प्राप्त संगठन किया करते थे पर अब सीधे संवैधानिक पद पर बैठे लोग करने लगे आपने कहा अतिथि शिक्षक गरीबों का भला नहीं करने दे रहे, यह रुकावट बन रहे हैं, इन्हें नौकरी से निकाल देना चाहिए, वहां मौजूद लोगों ने कहा निकाल दो और आपने उन्हें नौकरी से निकलवा दिया। सागर संभाग के कमिश्नर के पत्र पर दमोह के डीईओ ने कार्रवाई करते हुए 11 अतिथि शिक्षकों को सेवा से अलग कर दिया है।
आप मुख्यमंत्री हैं, आपके पास ताकत है, आप कुछ भी कर सकते हैं, यह लोग जानते है, इसीलिए तो वे उम्मीद में आपकी सभाओं में पहुंचते हैं, अपनी बात कहने की कोशिश करते हैं। आपसे न कहें तो किससे कहें? अतिथि शिक्षक आपको यही तो बताने आए थे कि आप उन्हें जो 2500 से 4500 रुपए महीना अलग अलग वर्ग को देते हैं, वह उन्हें 6-8 महीने से नहीं मिला। वे जो ज्ञापन लेकर आए थे उसमें लिखा था आपकी सरकार जो दे रही है, उससे न तो जिंदा रह सकते हैं और न ही मर सकते हैं। ज्ञापन के जरिए वे आपसे पूछ रहे थे कि भला दुनिया के किसी देश में 30 दिन काम करने वाले किसी व्यक्ति 2500 रुपए मिलते हैं यदि दुनिया के किसी देश में भी मिलते होंगे तो आगे से हम वेतन बढ़ाने की बात नहीं करेंगे।
अब जरा सोचिए, आपने जिस तरह हजारों की भीड़ को अतिथि शिक्षकों के खिलाफ उकसाया था, ऐसे में यदि वही भीड़ वहां मौजूद 25-50 अतिथि शिक्षकों पर टूट पड़ती तो क्या होता? हजारों लोग आपके लिए तालियां बजा रहे थे, ऐसे में 25-50 नहीं भी बजाते तो कौन-सा पहाड़ टूट पड़ता, आपकी लोकप्रियता जमीन में मिल जाती। लेकिन आपको 25-50 अतिथि शिक्षकों भी सहन नहीं हुए, कैसी विडंबना है यह। असहमति को अस्वीकार करने के और भी तरीके थे। वहां पुलिस मौजूद थी, उनके जरिए उन्हें बाहर निकलवाया जा सकता था। आपकी पार्टी के देशभक्त मौजूद थे, वे उनसे कह देते, वे बाहर कर देते, लेकिन आपने तो भीड़ को ही उकसाने का काम कर दिया। ये काम भी किसी राजनितिक दल के लिए पहला नहीं था इससे पहले भी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह भी गो रक्षा पर कोई ठोस कानून बनाये बिना ही सीधे फांसी देने की बात कर रहे थे , भीड़ इससे क्या सीख लेगी ये सोचा है आपने ? वो चौराहे पर फैसला लेने लगेगी कानून हाथ में लेने लगेगी । पहले कानून तो बनाइये ? खेर अभी तक ऐसा कार्य राजनितिक संरक्षण प्राप्त संगठन किया करते थे लेकिन अब ? अतिथियों के मामले में मुख्यमंत्री के इस काम को क्रूरता ही कहा जाएगा, जो आपने दमोह में अतिथि शिक्षकों के साथ की है।
आप इन दिनों मां नर्मदा को बचाने के अभियान पर निकले हुए हैं, क्या प्रदेश के 80 हजार बेटे-बेटियोंं की जिंदगी बचाने की जिम्मेदारी आपकी नहीं है, जो दसियों साल से आपसे सम्मान से जीने का हक मांग रहे हैं। जिन 11 अतिथि शिक्षकों को दमोह में नौकरी से निकाला गया है, उनमें 4-5 बेटियां भी हैं और यह सभी किसी न किसी मां के बेटे-बेटियां हैं। 80 हजार युवा अतिथियों को भूखा रखकर आप कौनसी नर्मदा सेवा कर लेंगे, यह तो सोचना ही चाहिए। जिन गरीबों को आपने अतिथियों के खिलाफ भडक़ाया है, उन्हीं गरीबों के बेटे-बेटियां हैं अतिथि शिक्षक, जिस दिन उन्होंने लोगों को भडक़ा दिया, तब क्या होगा? जरा सोचिए, इस तरफ भी।{ डॉअनिल जैन की कलम से}