क्या हम फक्र के साथ प्रेस फ्रीडम डे मना पाएंगे

प्रेस की आजादी – पर क्या सच में पत्रकार है आज़ाद ?
हर साल की 3 मई का दिन आते ही जहाँ तहाँ से देश दुनिया के पत्रकारों को शुभकामनाये बधाई और कई सन्देश आते हैं ये सब तकरीबन दो दशकों से देख सुन रहा हूँ । जब संचार के बहुत साधन नही थे तब अखबारों में फिर दिन बदले तो टी व्ही चैनल्स में और अब पिछले कुछ सालों में सोशल मीडिया पर। इसी सोशल मीडिया का दो वर्ष पुराना स्टेट्स आज फेसबुक ने रिमाइंड कराया तो बरबस ही विचार मन में उद्वेलित हुए और कुछ सार्थक चिन्तन लेखनी के जरिये आप सब से साझा करने का मन बनाया।
आज वक़्त के साथ पत्रकारिता के मायने बदले हैं। मुझ जैसे पत्रकार सम्भवतः पत्रकारिता के नए और पुराने दोनों रूपों को देखने वालों की फेहरिस्त का हिस्सा हैं। स्मरण आता है जब आज लिखी खबर को लिफाफे में रखकर जबलपुर और भोपाल भेजते थे और तीसरे दिन खबर अख़बार में छप कर पाठकों के बीच पहुंचती थी। साप्ताहिक अखबारों के साथ तो पूरे हफ्ते का इंतज़ार करना पड़ता था। वक़्त कुछ बदला और जमाना टी वही पत्रकारिता का आया। दूरदर्शन के बाद निजी चैनल्स का दौर आया तो अपने इलाके में पहला टी वही पत्रकार था। लिहाजा बहुत कुछ सिखाने वाले लोग नही थे लेकिन उसमें रहकर उससे सीखने का माद्दा इस क्षेत्र में लगातार प्रेरित करता रहा। हर घण्टे में 5 मिनिट का बुलेटिन और उस पर भी आज का घटनाक्रम दुसरे दिन प्रसारित होता था ख़ास तौर पर छोटे शहरों की खबरें। समय बदला संसाधन बड़े तो आज डिजिटल इंडिया के नारे के बीच अमूमन खबरे लाइव है। जो घट रहा है वो या तो चंद मिनिटों में या फिर लाइव दर्शक के बीच है। सात समंदर पार की तशवीरें सीधे आम आदमी की पहुंच में। इतना ही नही वाया पत्रकार आप तक खबरें पहुंचने के पहले ही हर घर हर शहर हर गली का अघोषित पत्रकार सोशल मीडिया के जरिये पहले ही लोगों तक खबर पहुंचा रहा है। ये दौर का बदलाव है आधुनिकता के युग में आधुनिकीकरण है। निसन्देह फटाफट और तेज गति का दौर है लेकिन यकीन या विश्वास भी इस क्षेत्र पर उसी तेजी के साथ कम होता चला जा रहा है। स्मरण आता है जब अखबार में छपी एक कॉलम की खबर खलबली मचा देती थी दमोह से लेकर दिल्ली तक उस खबर की चर्चा होती थी और शासन प्रशासन सख्त कदम उठाता था । लेकिन जिस लिहाज से इस क्षेत्र में बदलाव या विकास की बयार चली वो तमाम ताकत कम होती चली गई। पत्रकारिता के सिद्धांत स्वरूप आयाम सब बदल गए। अखबारों में पत्रकारों की जगह हॉकरों ने ले ली तो जिन बड़े बैनर के अखबारों ने अपने अपने संस्थानों में पत्रकारों को खबरों का जिम्मा दिया वो महज मजदूर बन कर रह गए अर्थात सुबह से देर रात तक सिर्फ दो या चार पन्ने भरने की जुगत और मेहनत में लीन रहने लगे। आलम न्यूज़ चैनल्स में भी एक सा है जहाँ के पत्रकार मजदूर से कम नही बस ऊपर का फरमान मानना मजबूरी बन गई।

ये सब तथ्य इस पेशे से जुडे लोग बखूबी जानते है लेकिन आम आदमी मतलब पाठक और दर्शक इन सब से आज भी अनजान है क्योंकि तमाम बदलाव और विकास के बाद भी आम नागरिक के लिए पत्रकार या रिपोर्टर आज भी समाज में विशिष्ट है उस पर यकीन करना उसे आता है तभी वो आशा भरी निगाहों से ना सिर्फ उसे देखता है बल्कि पत्रकार की हर खबर पर यकीन भी करता चला आ रहा है। किंतु इस सब के बीच आज कस्बाई इलाकों से लेकर महानगरों तक पत्रकार जनता की अदालत में कटघरे में भी खड़ा है। लोग विश्लेषण करने के साथ उस पर टिप्पड़ी आरोप प्रत्यारोप भी करते हैं तो आज हर खबर पब्लिक के निशाने पर भी रहती है। निचले स्तर से उथले यानी महानगरीय पत्रकार तक सब हर रोज जनमानस की गालियां खाने मजबूर हैं और अब जब सोशल मीडिया का जमाना है तो हर दिन लोग बेख़ौफ़ पत्रकारों की फोटो लगाकर उन्हें जलील कर रहे हैं और ये दौर भी लगातार गतिशील है। इस सब को देखकर पढ़कर और सुनकर निसन्देह पीढ़ा होती है क्योंकि हम भी उसी जमात का हिस्सा हैं जिस जमात के लोगों को गालियां मिल रही हैं। पहले इस बात पर अपना विरोध दर्ज करा कर लोगों से बहस भी करता था लेकिन अब लगता है कि बहस का कोई सार नही क्योंकि जनता की अदालत में सिर्फ एक गवाही पर्याप्त नही बल्कि पूरा सिस्टम ही दुरुस्त होना चाहिए।
ये कड़वी हकीकत है लेकिन जिस जनता या समाज के लिए पत्रकार काम कर रहा है उस तक हकीकत पहुंचना जरूरी है तो इस पत्रकार कौम और इसके रहनुमाओं को भी चिन्तन करने की नितांत आवश्यकता है। बीते 22 मार्च 2017 को राज्यसभा के भीतर देश के बड़े समाजवादी नेता श्री शरद यादव का भाषण बरबस ही याद आता है और शरद जी के भाषणों में निहित तथ्य सचमुच विचारणीय है। हम साल में एक दिन प्रेस की आजादी के बारे में चिंतन करते है सभाये सेमीनार विचार गोष्टियाँ और बड़े बड़े आयोजन करके पत्रकारों का महिमा मंडन करते है लेकिन सच तो ये हे की आज के परिवेश में पत्रकारों को 3 मई को प्रेस फ्रीडम डे ना मनाकर 1 मई वाले मजदुर दिवस का हिस्सा बन जाना चाहिए। यकीनन आज का पत्रकार एक मजदूर से कम नही जो मालिक के आदेश पर सुबह से रात तक मजदूरी करता है । अखबार और न्यूज चैनल्स की खबरों की भूंख के बीच उनका पेट भरकर अपनी और परिवार की भूंख शांत करने का इंतज़ाम करता है। में कहता हूँ की मौजूदा परिवेश में कस्बाई इलाकों में काम कर रहे पत्रकारों से लेकर महानगरों में ए सी चेम्बर में बैठे अव्वल दर्जे के पत्रकार तक सब मजदूर की श्रेणी में खड़े हैं फिर चाहे कोई कुछ भी दलील दे लेकिन उनकी अंतरात्मा से पूछिए की उनके साथ क्या सलूक होता है। पूरा मायाजाल पूंजीपतियों का भ्रमजाल बन के रह गया है। जिस सैद्धान्तिक पत्रकारिता की उम्मीद आम नागरिकों को रहती है या जो इस देश के मूर्धन्य पत्रकारों ने कभी सोचा होगा आज उन सिधान्तो को अघोषित तिलांजलि दी जा चुकी है । यकीन मानिए आज भी पत्रकार के भीतर सिद्धान्त कायम हैं सामाजिक विकृति और ग्लेमर की चकाचोंध के बीच भी जो नई पीढ़ी के युवा पत्रकार इस क्षेत्र में काम करने आ रहे हैं वो सदविचारों और समाजहित के उद्देश्य को लेकर ही आते हैं लेकिन उनके हाँथ में अब कुछ नही। मसलन खबर बनाना उनके हाँथ में हे लेकिन उसका प्रकाशन या प्रसारण होगा वो पत्रकार इस बात की दम नही भर सकता। यहाँ तक की उस संस्थान का मुखिया जिसे सम्पादक या एडिटर कहते हैं वो भी ये तय नही कर पाता की खबर चले छपे या नही । सच यही है कि अब सम्पादक नाम की संस्था ही खत्म हो चुकी है। अखबार या चैनल का मालिक ही सम्पादक के असली किरदार में है और वही खबर की अहमियत और स्वरूप तय करता है । कई दफा तो लगता है कि असल में अब पत्रकारिता ना होकर फ़िल्मी दुनिया ही हो गई है जहाँ डायरेक्टर के डायरेक्शन में पात्रों को अभिनय करना पड़ता है ठीक वैसे ही मालिक के इशारे या आदेश पर सम्पादक जमीनी पत्रकारों को निर्देश देता है और उस निर्देश का पालन पत्रकार कर रहा है। पर इस सब के बीच आक्रोश को जिसे झेलना पड़ता है वो हे जमीन या फील्ड पर काम करने वाला पत्रकार जो सही मायने में आज़ाद नही है जो किसी रिंग मास्टर के इशारे पर नाच रहा है करतब दिखा रहा है उसके बीच अभिव्यक्ति की आज़ादी और प्रेस की स्वतंत्रता जैसी बातें बेमानी ही है। ऊँचे ओहदों पर बैठे पत्रकारों के मन में भी यही पीढ़ा है जो बयान भी करना चाहते हैं पर उनके सामने भी रोजी रोटी का सवाल है लिहाजा ना चाहकर भी जबां खामोश रहती है। पर सवाल यही की क्या ये लोकतंत्रात्मक राष्ट्र के लिए हितकर है? जिस देश में आज़ादी की लड़ाई से लेकर आज तक पत्रकारिता का अहम योगदान है उस राष्ट्र में उसी क्षेत्र का ये हाल क्या समृद्द राष्ट्र की परिकल्पना को साकार कर सकता है। एक बार फिर शरद यादव जी के भाषण का जिक्र करूँगा जिसमें उन्होंने चिंता जाहिर करते हुये साफ़ कहा कि मीडिया या पत्रकारिता का क्षेत्र पूंजीपतियों से मुक्त होना चाहिए। सत्य है व्यापारियों पूंजीपतियों के निजी स्वार्थ पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों को खत्म करते जा रहे हैं। आम गरीब असहाय लोगों की आवाज टी आर पी के मकड़जाल में सिमट कर कहीं खो गई है। गरीबी भुखमरी बेरोजगारी और विकास का फोकस क्रिकेट के मैच सट्टा बाजार और फ़िल्मी अदाकारों के ठुमको में खत्म हो गया। चैनल्स और अखबार नेता निर्माण से लेकर सरकार निर्माण का जरिया बन गए। ब्रांडिंग का जरिया बनते संस्थानों से सिधान्तो की उम्मीद बेमानी ही है और इस दौर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की आज़ादी की दलील के बीच पत्रकार और उसकी आवाज विचार को आज़ाद कराने की महती आवश्यकता है । दिहाड़ी मजदूरों की श्रेणी में खड़े पत्रकार को कोसने वाले लोगों को इस बात का विचार भी करना होगा की आपके आसपास दिखाई देने वाले पत्रकार हों या सूट टाई पहनकर चीख चीख कर अपनी बात को देश दुनिया में पहुंचाने वाले ऊँचे ओहदे के पत्रकार उन्हें कोसने और गालियाँ देने से पहले इस हकीकत से रूबरू जरूर हो जाइये। सही मायने में अब देश के आम नागरिकों को इस दिशा में पहल करनी होगी की जिस पत्रकारिता के क्षेत्र पर आप यकीन करते हैं जिससे आपकी अपेक्षाएं है उस क्षेत्र को सशक्त बनाने के लिए देश में बड़ा आंदोलन खड़ा हो और सही मायनों में पत्रकारिता निर्भीक निष्पक्ष और आज़ाद हो। देश में इसे लेकर क़ानून बने और आने वाली पीढ़ी देश की पत्रकारिता के स्वर्णिम इतिहास को आत्मसात करके राष्ट्रहित में अपना योगदान दे। शायद तभी हम फक्र के साथ प्रेस फ्रीडम डे मना पाएंगे।
महेंद्र दुबे दमोह