“कलंक के तमगे से मिटे कुछ निशान पर दर्द अब भी हे बाकी”

दमोह/ बीते साल अचानक देर शाम दिल्ली के एक मित्र का फोन कॉल आया कुछ अजीब नही लगा क्योंकि अक्सर उनके फोन आते हैं लेकिन इस शाम मजाक में उसने जो कहा वो कहीं ना कहीं दिल को चुभा जरूर और चुभना भी लाज़मी था बात ही कुछ ऐसी थी । महोदय ने मजाक किया कि तुम्हारा शहर दमोह बेहद गन्दा है जरा सी टकराहट हुई लेकिन ये दलील उसकी नही थी बल्कि देश के नगरीय विकास मंत्रालय के देश में हुए सर्वे की सच्चाई थी। उस वक़्त तक सरकार की ये सर्वे रिपोर्ट सार्वजनिक नही हुई थी लेकिन उसके पास कॉपी थी बातों ही बातों में उसने मेल पर डिटेल भेजी तो पढ़कर वाकई ना स्तब्ध रह गया बल्कि शर्मिंदगी भी हुई । सच है जिस शहर में जन्म लिया जहां का दाना पानी नसीब में आया और सबसे अहम जिस शहर से बेपनाह मुहब्बत हो उसके लिए ये तमगा मिले बुरा तो लगता है। एक पत्रकार होने के नाते अफ़सोस के साथ खबर पर भी दिमाग गया । देश के लिए ये अहम खबर थी लेकिन मजबूरी की बड़े संस्थान न्यूज़ चैनल और अखबार बिना सम्बन्धित की बाईट वर्जन के खबर नही चलाते इसलिए दिक्कत भी थी। सरकार ने रिपोर्ट जारी नही की लेकिन जो रिपोर्ट हाँथ में आई वो विश्वसनीय थी। लिहाजा असाइनमेंट को इत्तला दी तो अपुष्ट खबर के नाम पर वहाँ से रुकने का आदेश मिला लेकिन अक्सर टी वी के पत्रकार एक्सक्लूसिव खबर की होड़ में ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं लिहाजा उस मनोवृत्ति से में भी घिरा था। मन में एन केन प्रकारेण खबर को चलाने की खलबली थी। मालूम चला दमोह सांसद प्रहलाद पटेल जी अपने बंगले पर है । तो सीधे उसी तरफ रुख किया । प्रहलाद जी को ये जानकारी दी की उनके संसदीय क्षेत्र का मुख्यालय यानी दमोह शहर देश का सबसे गन्दा शहर घोषित हुआ है तो उन्होंने भी मानने से इंकार कर दिया लेकिन जब कई दफा विश्वसनीयता बेहद काम आती है प्रहलाद जी के सवाल पर मेल से मिली रिपोर्ट को सामने रखा तो उन्होंने भी अचरज किया चूंकि मामला केंद्र सरकार से जुड़ा था लिहाजा सांसद की जवाबदेही भी बनती है उन्होंने तुरंत दिल्ली फोन लगाकर कन्फर्म किया तो बात सच थी लेकिन मंत्रालय की रिपोर्ट सार्वजनिक नही हुई थी । पर साहसी नेताओ में शुमार प्रहलाद जी ने बेहिचक कैमरे के सामने इस रिपोर्ट में दर्शाये हालातों पर चिंता जताई और स्वीकार भी किया कि स्थानीय प्रशासन ने जवाबदेही ठीक से नही निभाई लेकिन इस बात की दम भी भरी की समवेत प्रयासों से हालात बदलेंगे जरूर।

सांसद जी की बाईट होते ही अब ऊपर बताने के लिए कुछ दम जरूर आई तो रास्ते में ही असाइनमेंट से इसी खबर को लेकर फिर कॉल आया तो यहाँ भी काम की विश्वसनीयता ही दम मार रही थी। प्रहलाद जी की बाईट और सारा घटनाक्रम सामने रखा तो जल्दी ही खबर भेजने का आदेश मिला। सारी तैयारी पहले से थी लिहाजा कुछ मिनिटों में ही खबर चली गई और खबर बड़ी थी तो चैनल ने भी जारी बुलेटिन में ही उसे प्रमुख जगह दी। फिर क्या था एक एक कर पत्रकार मित्रो के फोन खबर की हकीकत और रिपोर्ट की कॉपी की मांग। घण्टे भर के भीतर ही देश के तमाम न्यूज़ चैनल्स मेरे शहर को बार बार गन्दा शहर कहने लगे। गली चौराहों में आलोचना आरोप प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो गया। अपने कर्म का फर्ज निभा चुका था कहीं ना कहीं इस बात को लेकर खुश था कि देश की बड़ी खबर को छोटे से शहर से बड़ी शक्ल दी लेकिन मलाल कलंकित करने वाले तमगे का था जो मिल ही चुका था। एक अजीब सी फीलिंग आ रही थी। कई दफा लगता कि शहर का आलम ठीक नही है लेकिन देश के कई शहरों में गया हूँ वहां गन्दगी के ढेर आँखों से देखे हैं जहाँ फैली गंदगी में चंद मिनिट रुक पाना मुश्किल हो जाता है फिर मेरे शहर में केंद्र सरकार की टीम ने ऐसा क्या देख लिया जिससे हम कलंकित हुए । बहुत सारे सवालों को मन ही मन उठाता और सुलझाता रहा पर ये जरूर मालूम था कि रात कटेगी तो सुबह से चैनल का डंडा जरूर चलेगा क्योंकि इस तरह की खबरे खबरिया चैनल्स के लिए उत्सव की तरह है जिसे मुद्दा बनाकर पूरे दिन ही क्या हफ्ते भर तक अलग अलग रूप में खेला जाएगा। ये जरूरी भी है क्योंकि मामला जनहित से जुड़ा था सरकार और प्रशासन को जगाने ये दिन भर का काम भी बेहद जरूरी है। जो सोच रहा था वही हुआ अलसुबह असाइनमेंट का फोन और इसी मुद्दे पर डिस्कर्शन । मानसिक रूप से तैयार था तो सब बातें हुई और जो असाइनमेंट की इक्षा थी उसके अनुरूप विजुअल बाईट कम्प्लीट पैकेज मटेरियल पहुंच गया। कुछ काम का बोझ कम हुआ तो फिर वही पीड़ा । साथी पत्रकार मित्र और अलग अलग विचारधाराओं के राजनैतिक साथी अपनी अपनी अभिव्यक्ति सामने रख रहे थे पर जिम्मेदारों पर दोषार्पण के साथ निचोड़ यही निकलता की हर नागरिक की नैतिक जवाबदारी भी बनती है कि वो अपना योगदान दे तो इस तरह कलंकित ना होना पड़े। कुछ लोग कटघरे में खड़े थे तो कुछ निशाने पर असली चर्चा सत्ताधारी पार्टी की क्योंकि नगर पालिका से लेकर दिल्ली की संसद तक राज उनका ही। जिस शहर के विधायक सूबे के सबसे कद्दावर मंत्री हो जहां के सांसद राष्ट्रीय स्तर के नेता हों और अतीत पर नजर डालें तो प्रायः हर सरकार में इस शहर में जन्मे या कर्म क्षेत्र बनाने वाले नेता मंत्री रहे हैं तब विकास बुनियादी सुविधाएं देश की सर्वे टीम को खटकना बड़ी बात है। दिन बीते तो जनजागरण के लिए कोशिशें हुई हर स्तर पर नागरिकों को इस बात के लिए प्रेरित किया गया कि कलंक मिटाने सब अपने अपने स्तर पर योगदान दें। केंद्र और प्रदेश सरकार ने गन्दगी मिटाने और खिताब को चोट का दर्द मिटाने करोड़ो रूपये जारी किये तो शहर के लिए स्वक्षता अभियान कई जगहों पर सेल्फी सेल्फी खेलने का खेल बना तो कई जगहों पर सिर्फ सोशल मीडिया की सुर्खियां बनने की कोशिश। लेकिन कुछ मायनो में इस दिशा में सार्थक कोशिशें भी हुई। क्लीन दमोह ग्रीन दमोह का नारा देकर मिशन ग्रीन दमोह चला तो शहर में हरियाली की उम्मीद भी नजर आने लगी। उम्मीद इसलिए की इस टीम के नोजवानो के साथ शहर के जागरूक नागरिकों ने जो पौधे रोपे हैं उन्हें व्रक्ष बनने में वक़्त लगेगा लिहाजा उम्मीद ही कही जा सकती है लेकिन इन व्रक्षो से विकास की बलि चढ़े वर्षो पुराने प्राचीन व्रक्षो की स्मृतियां खत्म हो ये संभव नही है। करोड़ो रूपये से शुरू हुआ नगरीय प्रशासन विभाग का स्वक्षता अभियान और जनभागीदारी वाला मिशन ग्रीन दमोह हो या सांसद श्री प्रहलाद पटेल की पहल से बेलाताल से शुरू हुआ सफाई अभियान श्री सिद्धार्थ मलैया के नेतृत्व में शहर के लोगों की टीम का तमाम तालाबो को साफ़ करने का सफर बहुत नही पर कुछ दिखता जरूर है। कलंकित तमगे के नाम पर मिली मोटी रकम नगर पालिका खर्च कर रही है तो केंद्र सरकार के ताजा आंकड़ों में इस बार सबसे गन्दे शहर का खिताब पडौसी राज्य उत्तर प्रदेश के शहर की तरफ बढ़ गया। निसन्देह इस सब से नगरीय प्रशासन के अफसर और नेता खुश तो हुए होंगे लेकिन गौर करना चाहिए की जिस तरह पैसा बहाया गया उस लिहाज से नम्बर नही बड़े। स्वक्षता के परीक्षण के लिए आई टीमो ने 2000 में से महज 906 अंक ही दिए हैं मतलब इस परीक्षा में पचास फीसदी अंक भी हम हासिल नही कर पाए ये भी सोचने लायक बात है। बात तो तब होती जब सूरते हाल एक दम बदलता । इन हालातों के लिए पहला दोष निसन्देह जिम्मेदारों मतलब इससे जुड़े अफसरों कर्मचारियों के साथ हमारे तमाम निर्वाचित जनप्रतिनिधियों जिनमे पार्षद अध्यक्ष विधायक सांसद सब शामिल है को दिया जाना चाहिए पर उतना ही दोष इस शहर के वाशिंदों को भी दिया जाए तो गलत नही होगा। शहर में प्लांनिग जैसे शब्द से पालिका और हमारे नेता एक दम दूर हैं। कहाँ क्या कैसे होना चाहिए कोई प्लान नहीं तो इस नगर के नागरिक गलत का विरोध भी नही कर पाते । लोगों के निजीस्वार्थ आड़े आएं तो फिर भले ही जहर पीना पड़े या सड़कों का सफर मौत का सफर बने लोग सबमे राजी है। ताज़ा उदाहरण इन दिनों डाली जा रही पाइप लाइन है। महज दो चार महीने पहले ही शहर की सड़कों का डामली करण हुआ बाजार थोड़े बहुत धुल के गुबारों से मुक्त हुए सड़कें देखकर एहसास ही हुआ था कि हम शहर में रह रहे हैं कि एहसास खत्म हो गया। अब पानी की पाइप लाइन के नाम पर बीच सड़क को खोदा जा रहा है धुल की वजह से लोग दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं पिछले 4 दिनों में 13 बाइक एक्सीडेंट में घायल 24 लोगों का इलाज तो में खुद करा चुका हूँ फिर आंकड़ा क्या होगा अनुमान लगाया जा सकता है। ये तो पानी की लाइन हे आये दिन वायर लाइन के नाम पर मोबाइल कम्पनिया सड़कों को छल्ली कर रही है। नियम के मुताबिक ये कम्पनिया सड़क को हुए नुकसान और उनके निर्माण की राशि सम्बन्धित विभाग में जमा करती हैं लेकिन ये पैसा आखिर लगता कहाँ है कोई बताने वाला नही। इस शहर के नागरिक भी जायज बातों के लिए पता नही कबसे सड़कों पर नही दिखे जबकि अपनी राजनीति चमकाने वीर योद्धा बेमतलब के मुद्दों पर शहर की फिजा खराब करने में पीछे नही हटते। साफ़ सफाई के हालात कितने बेहतर है इसका अंदाजा शहर के वार्डो में घूम रही कचरा गाड़ियों को देखकर लगाइये। सुबह नींद खुलती है तो आ गई आ गई कचरा गाड़ी आ गई की आवाज कानो में आती है लोगो को कचरा इस गाड़ी में डालना चाहिए लेकिन एक वार्ड के 20 से 25 घरों के लोग ही इसका इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि शेष के लिए गलियां नालियां मुहल्लों के सार्वजनिक स्थान ही कचरा डालने पसंदीदा जगह है और इस लिहाज से दोष इन पर मढ़ना भी जरूरी है। हम संतुष्टी लोग हैं शायद साल डेढ़ साल में सर्वे में बड़े कुछ अंक हमे संतुष्ट कर देंगे पर लगातार अंक बढ़ते चले इसकी कोशिश भी हम नही करेंगे। सवाल जनमानस से भी और जिम्मेदारों से भी की हालात कब सुधरेंगे। कब जिम्मेदार अपनी ड्यूटी ईमानदारी से निभाएंगे और शहर के नागरिक अपना दायित्व पूरा करने के साथ कब अनीति के खिलाफ बोलने का साहस दिखाएँगे? वक़्त हे अब भी सतर्क हो जाइये वरना जो हम भोग रहे हैं वो आने वाली पीढ़ी को और ज्यादा भोगना पड़ेगा।
महेंद्र दुबे दमोह