#एकथा_टाईगर *गरीबो के मसीहा थे “दादा” रामलुभाया

*बीसवी सदी के महानायक की पुण्यतिथि
#मध्यप्रदेश के सागर जिले मे रहली के इतिहास में एक ऐसे महान समाजसेवी महामानव हुए है जिन्होने अपना पूरा जीवन सामाजिक सरोकार को अर्पित कर दिया।सेवाभाव के सशक्त हस्ताक्षर स्व.दादा रामलुभाया ने अपने पूरे जीवन काल में हजारों लोगों की विभिन्न माध्यमो से सहायता कर इंसानियत की जो इबारत लिखी है वह आम आदमी के लिए प्रेरणादायी है।20 वी सदी के महानायक दादा का जन्म पश्चिमी पंजाब के सियाल तहसील के अहमदपुर ग्राम में हुआ था जो आज पाकिस्तान का हिस्सा है।सन 1966 में कपड़े के व्यापारी के रूप में रहली आये और यही रम गए।दादा ने संघ परिवार के माध्यम से समाज सेवा की शुरुवात की वो सन 1970 से 1978 तक तहसील कार्यवाहक के रूप में काम करते हुए संघ की जड़े स्थापित की संघ के द्वारा उन्हें महाकौशल प्रान्त सेवा प्रमुख का दायित्व सौपा गया जिसका निर्वाहन लगातार 28 साल तक किया।जनसंघ से लेकर जनता पार्टी और भाजपा के साथ विश्व हिन्दू परिषद को क्षेत्र में स्थापित करने ने में दादा तन,मन,धन सहित अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया।वो भाजपा के मंडल अध्यक्ष और और लंबे समय तक जिला उपाध्यक्ष रहे।राष्टीय स्तर के नेताओ के प्रिय रहे दादा को धर्म यात्रा संघ में राष्टीय उपाध्यक्ष का दायित्व भी सौपा गया।

दादा ने अपने सामाजिक जीवन मे गरीबो,बीमारो,असहायों की बेतहासा मदद की जनहित में शासन प्रसाशन से पूरे जीवन संघर्ष करने वाले दादा आपात काल के दौरान 26 जून 1975 से 18 अप्रैल 1977 तक मीसा बंदी के रूप में जिला जेल सागर में कैद रहे।दादा अदम्य साहसी और तीखी शैली के प्रखर बक्ता थे बेबाक बोली के कारण उन पर कई बार हमले हुए पुलिस में मामले दर्ज हुए उन्हें तोड़ने के लिए भरपूर प्रयास किए गए पर वो न तो टूटे न ही झुके।दादा ने अपना पूरा संघर्ष स्वयं के बलबूते पर किया वो “वन मेन आर्मी”थे। जिद के पक्के और कभी पीछे न मुड़कर देखने वाले दादा ने पूरा जीवन निःस्वार्थ सेवा में बिताया सक्रिय राजनीति में रहते हुए न तो उन्होंने कभी कोई चुनाव लड़ा न ही किसी प्रकार का लाभ लेने का प्रयास किया।व्यसन मुक्त एवं सात्विक जीवन को आत्मसाद करने वाले दादा का “संग्राम जिंदगी है ,लड़ना इसे पड़ेगा।जो लड़ नही सकेगा,बाकी नही बचेगा”मूल मंत्र था।
रहली के कुण्डीकांड के हीरो दादा रामलुभाया सेवाभावी के साथ परम दानी भी थे।क्षेत्र के गरीब लोगों की तो आर्थिक मदद करते ही थे साथ ही त्रासदी के समय देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर भी लोगो की सहायता करते थे।लातूर में भूकंप त्रासदी के दौरान पीड़ितों की मदद करने के लिए दादा रहली से अपने वाहन से सामग्री लेकर गए थे।
निःस्वार्थ भाव से गरीबो, बीमारी,असहायों,लाचारों की मदद करने वाले और जनहित के मुद्दों को लेकर शासन प्रसाशन के खिलाफ जंग लड़ने वाले दादा मुसीबत की घड़ी में आज भी लोगो को याद आते है।दादा के स्वर्गवासी होने के वाद रहली क्षेत्र में शून्यता का माहौल है। अब कोई जनहितैषी मुद्दों को उठाने वाला,पीड़ितों की मदद करने वाला नही रहा है।दादा की व्यवसायिक विरासत को उनके बड़े पुत्र सुंदरलाल पसरीचा संभाल रहे हैं जबकि उनकी समर्पण की विरासत को उनके छोटे पुत्र भीमसेन पसरीचा आगे बढ़ा रहे हैं।भीमसेन गुजरात के महानगर सूरत में विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष के दायित्व का निर्वाहन करने के साथ समाज सेवा में रत है।
पूरा जीवन शेर की तरह जीने वाले दादा रामलुभाया अपने नेककर्मो के कारण हमेशा लोगो के दिलो में रहेंगे।
रहली के क्रांतिवीर स्व.दादा रामलुभाया जी की तेरहवीं पुण्यतिथी पर सादर श्रद्धांजली ,शतशत बार नमन।
{ डॉअनिल जैन की कलम से}